Wednesday, 18 December 2013

हो उदित स्वप्न क्यों बिखर रहे
मधुर मनोहरतम अंतर वाले
हर्षाते दुलारते बाल -बृन्द -खग
मोहक मृदुल मधुर स्वर वाले
उजड़े उपवन के बीच खड़ी
उज्ज्वल औद्योगिक यह प्रतिमा
क्षय परिवर्तित सुरभि क्षय -क्षय
श्वाँस अवरुद्ध दम तोड़ हरीतिमा
पल्लव पल्लव आज सँवरते
सूखी शाखा रोज निखरते
विकृत दृष्टिकोणों की कृति में
बिना छंद ये शब्द उजडते
बांध रहे तुम धारा को
गंतव्य प्रयोजन मात्र नहीं
ज्ञेय मात्र अवलम्बन जो हो
पर स्थूल नहीं ये सूक्ष्म नहीं
होगा जो भी मेरे मन
अनुभूति तर्क या विश्लेषण
भाव महोदधि आनंद मात्र या
मनसा -विधि -भाषा -सम्प्रेषण
विधि ये साधन उद्देश्य नहीं
संवेदन प्रतिसंवेदन संवेदन
विजित प्राप्य ये देय नहीं
गतिज शून्य मृत जीवन जीवन।

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