Sunday, 15 December 2013

जिंदगी के कई दाँत हैं
जिसके पीछे एक जीभ है
उम्र से ज्यादा चलती है
यौवन के उन्माद में मचलती है
जहां तमाम वाद है
अनेकों स्वाद हैं
बंजर जमीन पर
बोरे में बीज है
बोरे में खाद है
इस्तेहार में अच्छी फसल का
रंगीन ख्वाब हैं
कागज का खेत आबाद है
मिट्टी का खेत बर्बाद है
खेत वाला टुकुर टुकुर ताकता है
मेड़ पर काँखता है
एक बित्ता ज़मीन नापता है
सिर से पैर तक काँपता है
जिंदगी में मौत जाँचता है
भगवान से लेकर सरकार तक
सारी प्रार्थनाएं बांचता है
दोनों उससे बहुत दूर हैं
उस पर कृपा के लिए मशहूर हैं


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