Tuesday, 31 December 2013

देखिये पाते है उश्शाक बुतों से क्या फैज़
इक बरहमन ने कहा है येह साल अच्छा है
हमको भी मालूम है जन्नत की हकीकत  लेकिन
दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है ।
ये नया साल नए साल की सूरत आये ,
मेरे हिस्से में भी कुछ आपकी कुर्बत आये
Happy new year to all my friends and their family.

उश्शाक़ बुतों से क्या पाते हैं फैज़
एक बरहमन ने कहा है ,
ये साल अच्छा है ,
मुझे भी मालूम है जन्नत की हकीकत ,
लेकिन दिल बहलाने को ग़ालिब ,
ये ख़याल अच्छा है
ये नया साल ,नए साल की सूरत  आये ।
कुछ मेरे हिस्से

Friday, 20 December 2013

       नयी भूख

न्यूटन और आइंस्टीन की आत्माओं
तुमसे पूछता हूँ
तूने ऐसी कोई मशीन क्यों नहीं बनायीं
जिससे कि भूख न लगे
और टॉमस अल्वा एडिसन
तुम्हें क्या बतायें
तुम्हारे बनाये हुए बल्ब की रोशनी में
अँधेरे जलाते -बुझते हैं
जाने -अनजाने तुम लोगों नें
अपनें फार्मूलों से
 एक और नयी भूख गढ़ दी
मशीन नें आदमी की रोटी छीन ली
दिन पर दिन पेट बड़ा होता गया
आदमी आदमी होने की अस्मिता खोता गया
इस पेट के बाहर कई पेटों की परिधियाँ
भूख की योजना बनाती हैं
खाली अँतड़ियों का आँकड़ा जुटाती है
रोन्टजेन तुम्हारे एक्स -रे मशीन में
भूख का कोई चित्र नहीं आता
कि समाज कई तरह से भूखा है
असली भूख से नकली भूख बड़ी है
इसी की शांति की हरबड़ी है
विज्ञान के भूखे वैज्ञानिकों !
तुम्हारे फार्मूले और अन्वेषण
सुविधा के भूख में पचकर
नयी   तरीके की भूख गढ़ रही है
यह सदी नए दौर की भूख से गुजर रही है
                                     अनिल कुमार शर्मा

Wednesday, 18 December 2013

यही कुछ कहता हूँ
एक अजीब दुनिया में रहता हूँ
जहाँ न शब्द है न अर्थ है
जिन्दगियाँ ब्यर्थ हैं
सब अपने तरीके से
सक्षम हैं समर्थ हैं
फिर भी मुझे लगता है
कहीं एक कोना खाली है
समृद्धि में भी कंगाली है
मैं वही जानना चाहता हूँ
जिसे आज तक नहीं जान पाया
जिंदगी कसमें बहुत खाया
 बेशर्म हो कर इतना शरमाया
कि लाज भी लजाने लगी
नए ज़माने की दुकान सजाने लगी
मैं हर अंगों में बिक रहा हूँ
  इस बाजार में कहानी लिख रहा हूँ
  बाहरी सजावट के फेर में
  भीतर -भीतर खोखला दिख रहा हूँ।  
खुले होठ पर जबान बंद है
 पराग है मकरंद है
बिखरे हुए सुगंध में
सुरभि क्यों पाबन्द है ?

हो उदित स्वप्न क्यों बिखर रहे
मधुर मनोहरतम अंतर वाले
हर्षाते दुलारते बाल -बृन्द -खग
मोहक मृदुल मधुर स्वर वाले
उजड़े उपवन के बीच खड़ी
उज्ज्वल औद्योगिक यह प्रतिमा
क्षय परिवर्तित सुरभि क्षय -क्षय
श्वाँस अवरुद्ध दम तोड़ हरीतिमा
पल्लव पल्लव आज सँवरते
सूखी शाखा रोज निखरते
विकृत दृष्टिकोणों की कृति में
बिना छंद ये शब्द उजडते
बांध रहे तुम धारा को
गंतव्य प्रयोजन मात्र नहीं
ज्ञेय मात्र अवलम्बन जो हो
पर स्थूल नहीं ये सूक्ष्म नहीं
होगा जो भी मेरे मन
अनुभूति तर्क या विश्लेषण
भाव महोदधि आनंद मात्र या
मनसा -विधि -भाषा -सम्प्रेषण
विधि ये साधन उद्देश्य नहीं
संवेदन प्रतिसंवेदन संवेदन
विजित प्राप्य ये देय नहीं
गतिज शून्य मृत जीवन जीवन।
कहीं से एक फूल चुरा लाया
उनके गुलदस्ते में लगा आया
किस्मत उन जुल्फों की कहो
फूल उनकी गजरा में समा आया
पतझङ में सारी  उम्र गुजर गयी
कफ़न के ऊपर बहार आया

Sunday, 15 December 2013

जिंदगी के कई दाँत हैं
जिसके पीछे एक जीभ है
उम्र से ज्यादा चलती है
यौवन के उन्माद में मचलती है
जहां तमाम वाद है
अनेकों स्वाद हैं
बंजर जमीन पर
बोरे में बीज है
बोरे में खाद है
इस्तेहार में अच्छी फसल का
रंगीन ख्वाब हैं
कागज का खेत आबाद है
मिट्टी का खेत बर्बाद है
खेत वाला टुकुर टुकुर ताकता है
मेड़ पर काँखता है
एक बित्ता ज़मीन नापता है
सिर से पैर तक काँपता है
जिंदगी में मौत जाँचता है
भगवान से लेकर सरकार तक
सारी प्रार्थनाएं बांचता है
दोनों उससे बहुत दूर हैं
उस पर कृपा के लिए मशहूर हैं


Friday, 13 December 2013


भूखे लोग सो गए नींद में
जिन्हे अपच हो गयी थी खाकर
बार -बार शौच में जा रहे थे
भोजन से ज्यादा दवा खा रहे थे
लगता था औकात में आ रहे थे
क्योंकि भूखे आदमी का चेला
राजधानी के पेटुओं के गोदाम में
झाड़ू लेकर घुस गया
दही के ऊपर जमे हुए मलाई का
एक तह टूट गया
गरीबों की फसल चर कर
अमीरों के टॉयलेट में जाने वालों का
भण्डा फुट गया
एक आम आदमी
उनकी नींद लूट गया
किन्तु आम आदमी
उनकी नींद की गोली मत खाना
रास्ते पर खुली आँख से जाना
कालिख के चकाचौंध अँधेरे में
गुमराह मत हो जाना
क्योंकि जनता जाग कर सोती है
देश की किस्मत पर रोती है
यही गम है
यहाँ उम्मीदें कम है
भूख से ज्यादा भूखे है
अंदाज उनके रूखे है
बगीचे के पेंड़ अभी सूखे है
जोते खेत में पड़े बीज की तरह
अंकुरण में अभी हरे हो
कौओं के कांव -कांव में
लगते अभी सुनहरे हो
तूफानों के किनारे खड़े हो
औकात में अभी घड़े हो

Wednesday, 11 December 2013

हवा हवा में तुम हवा बने हो
उसकी गलती की दवा बने हो
अरमानों को पाले बैठे हो
मधुर स्वप्न में ऐठें  हो
सुन लो रह कटीली है
महॅगाई  में सबकी जेबें ढीली है
बरसाती  मेढक उछल लिए
मौसम में अब आया पाला है
लुटेरा वही अब रखवाला है
उस कोठी की बात निराली है
भीतर भीतर भरी भरी
बाहर बाहर खाली है
तकदीर जहाँ पर बनती है
उकठे पेङों की डाली है
मरुभूमि में तुम झूल रहे हो
कागज के फूलों से फूल रहे हो
गंध हीन  आकर्षक हो
तीर विहीन तरकश हो
अजूबे करामात दिखने वाले
एक अनोखे सर्कस हो
हैम देख रहे तुम दिखा रहे हो
बातें नयी बता रहे हो
बिना चूल्हे के गरम तवा बने हो
हवा हवा में हवा बने हो

नेता -गान
धन-गण-बल -गण अतिपातक जय हे
भारत के दुःख दाता
स्वीस बैक में खोलो खाता
उच्छल दंगा , नेता -नंगा
दल-बदल तरंगा ,जन-जीवन भंगा
भारत के चतुर चाण्डालों
खादी के भक्कू में काला धन डालो
ले जाओ उसे विदेश
बेचो अपना देश
चल-कल-छल-बल-राग द्वेष
साम -दाम -दंड -भेद
मंत्री अफसर का दामन काला
नित गढ़ नया घोटाला
तब भूख जागे आगे
भय मारे जनता भागे -भागे
वेश बदल कर आता वोट कराता
जय जय जय जय हो मतदाता
भारत के दुःख-दर्द विधाता
धन-बल ,छल-बल ,कल -बल जनमत हर हे
जाँत -पाँत  क्षेत्र धर्म सब कुकर्म पर
मत मत मत मत दे
जन-तन -मन -धन गण हे !
भय भय भय भय हे

जीवन के हर पग पर कुछ राहें अनजान मिली
इन्ही अपरिचित चेहरों में कुछ पहचान मिली
दिनकर के आँखों में कोई रजनी खास मिली
सुरभित केशों के छाये में मधुर  उच्छ्वास मिली
 


इस पल को जीने दो

इस पल को जीने दो
स्मृति यो को पीने दो
यह जीवन एक प्याला है
काया पीने वाला है
मन का दस्तूर जहाँ पर
साकी है मधुशाला है