Tuesday, 24 February 2015

अपने आदमी की  शक्ल के भीतर
ढूंढता हूँ उस आदमी के रूह को
जिसमे संक्रमण का दौर है
आत्मा और परमात्मा के बीच का आदमी
क्यों अपनी आदमियत खो दिया
तमाम धर्मो का अमरबेल बो दिया
जो  आदमी के रस को चूसकर
हरा भरा स्वरुप पाया है
खोखले आदमी के ऊपर छाया है
 क्या यही परम  पुरुष की माया है ?
अनिल कुमार शर्मा
25/02/2015

Monday, 23 February 2015

किस दुःख को याद करू
किस सुख की बात करू
जीवन के झंझावातों में
कैसे कैसे जज्बात भरु
कोमल बचपन का उषाकाल
खिले यौवन की वह दोपहरी
सुरभित मधुमय  संवेगों में
स्वप्निल पल अभिसार भरी
घट है यह जीवन का
या जीवन का घट घट
कंटकाकीर्ण यथार्थ पगों में
बद्ध नित्य का खट पट
कुछ मूल्य संजोये बैठा हूँ
खुद में खुद से ऐंठा हूँ
अंदर में अति आहत हूँ
संवेगों में गहरा पैठा हूँ
जीवन के इस रिक्त पात्र में
कैसे अवसाद भरे आह्लाद भरु
किस दुःख को याद करू
किस सुख की बात करू ।
अनिल कुमार शर्मा
24/02/2015

Tuesday, 17 February 2015

कुछ लकीरें खिंच गयी है हाथ में
कुछ लकीरें मिट गयी है हाथ से
भाग्य   अपना जो भी था
आज क्यों पराया हो गया
खुद के सपनों का महल
किस गह्वर में खो गया
हरे भरे बाग़ में भी 
आशियाने क्यों बिरान  है
हर कदम पर ठोकरें ही ठोकरें
आज इंसान क्यों हैरान है
जो पता देती थी बहारों की
वो हवाएँ किधर बह गयीं
नदी के सूखे किनारों पर
डूबती कश्ती कहानी कह गयी
सपनों में सींची हुई कली
फूल बनने से पूर्व ही बह गयी ।
अनिल कुमार शर्मा
१८/०२/२०१५



Monday, 16 February 2015

हे शिव आपने
अपनी नगरी में आये
याचक भस्मासुर को
पुनः  वही वरदान दे दिया
सत्ता मोहिनी के प्रेम में
वह  प्रफुल्लित  नाच रहा है
 जगह जगह वही वरदान बाच रहा है
हे शिव आप तो अवढरदानी  है
स्वयं ही  आग है पानी है 
जगत  की रवानी है
मोहिनी के नृत्य का
कब पूरा रस्म होगा
यह भस्मासुर
कब भस्म होगा ।
अनिल कुमार शर्मा
शुभ शिवरात्रि
17/02/2015

Wednesday, 4 February 2015

इन जिंदगी भरे कतारों में
मैं भी एक कतार हूँ
जहाँ प्रारम्भ में भी कुछ था
और अंत में भी कुछ रहेगा
आदमी अपनी भाषा में सदैव कहेगा
ज़मीन में धंस कर भी
जीवाश्म होने की प्रतीति तक
संवेदनाएं पुष्ट है
जिंदगी जिंदगी से रुष्ट है
कुछ उदार तो कुछ दुष्ट है
ऊषा के प्रारम्भ से
दिवस के आलोक के पश्चात
संध्या के अवसान पर्यन्त निशा की
स्तब्द्ध प्रतीति की संवेदनाएं
सतत प्रवाह के गह्वर में
क्यों इतनी अनुत्तरित हैं
भाषा की सृष्टि में
मनुष्य का श्रुति बन जाना
चेतनामय प्रवाह का एक उत्तर है
प्रकृति चक्र की धारा से इतर
आलोड़ित अंतस्तल के भीतर है
वह मनुष्य ही है
जो बाहर भी चलता है
और भीतर भी चलता है
स्वयं की अग्नि में पिघलता है
स्वभाव का अतिक्रमण कर
सार्वभौम बनकर चलता है
काल के कारखाने में
समय के साँचे में
इतिहास बन कर ढलता है ।
अनिल कुमार शर्मा
०५/०२/२०१५

Sunday, 1 February 2015

Small and big
Listen my colleague
Something descend from the heaven
And something ascend from the earth
But it is always in dire dearth
Our dream and desire
Add fuel to the fire
This is a nice pyre
Burden of life and tire
Love for hate and hate for love
And a void treasure trove
A beauty is not always beautiful
Values and morals are narrow tools
I love this beyond all aesthetics 
My concrete and abstract
Somebody attract and admire
Somebody do not care a fig
Listen me my colleague
Small and big
Anil Kumar Sharma
01/02/2015