Monday, 26 February 2018

जब कभी मेरा मुझसे सामना होता है
जाने क्यों मन अनमना होता है
बाहरी विस्तार में फट गया हूँ
भीतर भी ज्यादा सिमट गया हूँ
उजालों की ये रंगीनियां हैं
अंधेरों की  ग़मगीनियाँ हैं
सितारे माहताब  बनना  चाहते हैं
जुगुनू आफताब  बनना  चाहते हैं
जेब में  धरती और मुट्ठी में
सारा आसमान करना चाहते है
पूंजी की तरह पसर कर
 अजीब संसार होना चाहते है
लटकने इस कदर  लटक रही हैं
जैसे पूरी दुनिया गटक रही हैं
अस्तित्व के छिलके बिखरे पड़े हैं
चेतना के स्वर किस कदर सड़े हैं
रोज मरी हुई जिंदगी जी रहे हैं
व्यवस्था की दरिंदगी पी रहे हैं
खुद से हट कर खुद को छुपा रहा हूँ
दोस्त अपनी बेखुदी दिखा रहा हूँ
क्यों इस ढोंग को थामना होता है ?
जब कभी मेरा मुझसे सामना होता है
जाने क्यों मन अनमना होता है |
अनिल कुमार शर्मा
26/02/2018

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