देश पूरी धरती पर
एक धरती का टुकड़ा है
जिस पर लोग रहते है
इसे अपना -अपना राष्ट्र कहते हैं
इस पर रोज मान और अपमान सहते हैं
इसके लिए कितनों के खून बहते हैं
देश एक संपृक्त भावना है
जिसमें सद्भावना और दुर्भावना है
अशक्तों पर सशक्तों की स्थापना है
संविधान में एकता की संभावना है
जनता है सरकार है
न्याय का दरबार है
कानूनों की भरमार है
विधायिका अपरम्पार है
कार्यपालिका में भ्रष्टाचार है
न्यायपालिका में जुगाड़ है
मिडिया का रोजी -रोजगार है
देश की सीमा के बाद
कई दूसरे देश हैं
जहाँ सीमा का विवाद है
इसमे भीतरी और बाहरी खतरे हैं
कोई आबाद तो कोई बर्बाद है
देश से पहले और देश के बाद
हमेशा कोई न कोई देश है
जिसमे हजारों सन्देश हैं
इसीमे देशप्रेमी और देशद्रोही हैं
सत्ताभक्त और विद्रोही हैं
सभी पर इस मिट्टी का क़र्ज़ है
देशप्रेम एक पवित्र फ़र्ज़ है
अनिल कुमार शर्मा
२१/०२/२०१८
एक धरती का टुकड़ा है
जिस पर लोग रहते है
इसे अपना -अपना राष्ट्र कहते हैं
इस पर रोज मान और अपमान सहते हैं
इसके लिए कितनों के खून बहते हैं
देश एक संपृक्त भावना है
जिसमें सद्भावना और दुर्भावना है
अशक्तों पर सशक्तों की स्थापना है
संविधान में एकता की संभावना है
जनता है सरकार है
न्याय का दरबार है
कानूनों की भरमार है
विधायिका अपरम्पार है
कार्यपालिका में भ्रष्टाचार है
न्यायपालिका में जुगाड़ है
मिडिया का रोजी -रोजगार है
देश की सीमा के बाद
कई दूसरे देश हैं
जहाँ सीमा का विवाद है
इसमे भीतरी और बाहरी खतरे हैं
कोई आबाद तो कोई बर्बाद है
देश से पहले और देश के बाद
हमेशा कोई न कोई देश है
जिसमे हजारों सन्देश हैं
इसीमे देशप्रेमी और देशद्रोही हैं
सत्ताभक्त और विद्रोही हैं
सभी पर इस मिट्टी का क़र्ज़ है
देशप्रेम एक पवित्र फ़र्ज़ है
अनिल कुमार शर्मा
२१/०२/२०१८
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