Thursday, 22 February 2018

गांव वाले मेरा गांव पूछते हैं
शहर वाले मेरा शहर पूछते हैं
जाति वाले मेरी जाति पूछते हैं
धर्म वाले मेरा धर्म पूछते हैं
देश वाले मेरा देश पूछते हैं
प्रदेश वाले मेरा प्रदेश पूछते हैं
राष्ट्र वाले मेरा राष्ट्र पूछते हैं
खुदा वाले मेरा खुदा पूछते हैं
पार्टी वाले मेरी पार्टी पूछते हैं
विचारधारा वाले मेरी विचारधारा पूछते हैं
यूँ ही बहने वाले किनारा पूछते हैं
दोस्त तुम तो सिर्फ हाल -चाल पूछते हो
कभी -कभी मेरा खयाल पूछते हो
तबियत वाले मेरी तबियत पूछते है
खैरियत वाले मेरी खैरियत पूछते हैं
कभी -कभी आदमी की शक्ल में
कुछ लोग मेरी आदमियत पूछते हैं
एक आदमी के ऊपर पहचान के
परत दर परत इतने चढ़ते जाते हैं
कि वह आदमियत शून्य ढांचे की तरह
कई लबादों में ढक जाता है
पहचान के इन्ही खंडहरों  में छटपटाता है
इसी में वह जीतता है हारता है
अपने भीतर के आदमी को
कई तरीके से मारता है
समस्या विकट है
इस दौर का यही संकट है
सत्य का अजीब पाखंड है
यह कौन सा कालखण्ड है ?
अनिल कुमार शर्मा
२२/०२/२०१८



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