Tuesday, 24 May 2016

लमही के घूरे पर उगे कुकुरमुत्ते के साये में
कुछ काशी कुछ केदार कुछ विश्वनाथ पल रहे है
एक परम्परा से दूसरी परम्परा में ढल रहे है
एक विचित्र हिंदी पहनकर चल रहे है
यह हिंदी मुझे उसी तरह आती है
जैसे नई बहू ससुर के आगे शरमाती है
घुँघट में रसमलाई खाती है
भसुर से नहीं छुआती है
रचना के पंख पर बैठकर
आलोचना से पीछा छुड़ाती है
 रचना सरस्वती के हाथ में
 झंकृत वीणा की  उदात्त राग है
आलोचना सरस्वती को ढोता हंस है
नीर -छीर विवेक का सुधी परमहंस है
कला इसी चाल से चलती है
रचना सम्यक आलोचना में पलती है
शाश्वत परम्परा के ये मूल्य हैं
विवेचना इसी सीमा के समतुल्य है
टुकड़े- टुकड़े बटे  ज्ञान को
साहित्य एक धागे में पिरोता है
इसी में आदमी पशु से मनुष्य होता है
यही बात लमही के घूरे में सड़ गयी
कुकुरमुत्ते के आँख में रोशनी मर गयी
अब रंगीन चश्मे जेब में है
आदमी का रंग फरेब में है
अब तो रचना में चापलूसी है
चावल में ज्यादा  भूसी है
आजादी के बाद की  यह पहलौठी है
दूसरी परम्परा को ढोता कोई चौथी है ।
अनिल कुमार शर्मा
२४/०५/२०१६







Saturday, 7 May 2016

आज इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ
गुदगुदी तकिया और रंगीन लिहाफ हूँ
नारियल की तरह भीतर कोमल
बाहर रुखा और  बेहद कठोर हूँ
स्वादहीन अनुभूति समेटे हुए
भाषा और शब्द में  चटोर हूँ
कुछ  रस भी  रिसता है
भाव और सन्दर्भ किसका  है?
इस अजीब सी दुनिया में
कितने तरह का संसार पिसता है
रोज रोज कितने चेहरे बदलते है
मरी हुई ज़मीर पर सजते हैं
बनावटी सरोकारों में लिपटकर
पाक साफ और निष्पाप हूँ
आज के इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
08/05/2016



इस उजड़े हुए घर में
कुछ सजे हुए लोग रहते है
कितने संयोग -वियोग रहते हैं
एक तमाशा है इस जिंदगी में
या जिंदगी ही एक तमाशा है
एक चाल है तो  दूसरा पासा  है
एक चलता है दूसरा चलाता है
किसी की जड़ कोई हिलाता है
नयी नयी उम्मीद पिलाता है
अब इस उजाड़ खण्ड में मैं  भी हूँ
तूफान में उजड़े घरों की तरह
अकाल में अधमरों की तरह
अब तो लूटी रोशनी में
रंगीन अँधेरे चमकते है
अब तो सजे हुए लोग ही
उजड़े हुए लोगों का माल गटकते है
अपने असली सिर को बचाकर
हमारे लिए नकली माथा पटकते हैं
और किसी पतली गली से सरकते हैं
अनिल कुमार शर्मा
07/05/2016












Thursday, 5 May 2016

तुम्हारे होठ इस कदर हिलते हैं
जैसे बिखरे हुए गुलाब मिलते हैं
कली चटखती है
रजनीगंधा गमकती है
तुम्हारी निगाहों में कोई
रोशनी चमकती है
प्रकृति की सारी मनोरम छवि
क्यों तुझमे ही समायी है
क्यों तुम्हारे रूप में
मेरे हृदय की ख़ुशी बन आयी है
चिड़िया चहकती है
चमेली महकती है
तेरी सांसों में होकर
मेरी साँस चलती है
इसी तरह मेरे अरमान खिलते हैं
तुम्हारे होठ इस तरह हिलते हैं
जैसे बिखरे हुए गुलाब मिलते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
05/05/2016

Sunday, 1 May 2016

समय में जो टिक नहीं सका
उस इतिहास को टिका रहा हूँ
लहकते पेट की मजबूरियां
और स्वप्निल क्रांति का तर्क
सभी दुष्चक्रों को उखाड़ते हुए
क्यों खुद उखड़ गया ?
स्वप्न का  झनझनाना 
और नींद भी अधूरी
विभ्रम और यथार्थ की दूरी
समय और चाल दोनों थके -थके से हैं
विचार और विचारधारा पके -पके से हैं
एक धुंध के बीच स्वप्न चाल चल रहा हूँ
किसी खामोश अतीत में ढल  रहा हूँ
भूख भी वही है चीत्कार भी वही है
बस एक साजिश ही नयी है
नए सवालों के सन्दर्भ भी
पुरानी हाड़ी में पका रहा हूँ
समय में जो टिक नहीं सका
उसे इतिहास में टिका रहा हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
01/05/2016
( सभी को  मई दिवस की शुभकामनाऍ )