सोया हुआ सच
और जागा हुआ झूठ
सिर्फ भावनाओं की लूट
सतह के ऊपर उठती हुई सतह
परत दर परत दफ़न हुई उम्मीद
सीने में कचोटते हुए से स्वप्न
अब कराहने भी नहीं देते
जहर जितना था
उससे भी जहरीली जिंदगी हो गयी
यह उम्मीद किस कदर खो गयी
अब तो शुद्ध आदमी और
अशुद्ध आदमी का चक्कर है
सिर्फ टक्कर है और टक्कर है
वो टकराते हैं हम पिस जाते है
हमें आटे की तरह सान कर खाते हैं
तमाम योजनाओं में पचाते हैं
गुल्लक में रेजगारी की तरह बचाते हैं
अपनी जरुरत पर फोड़ते हैं
अपना हिसाब जोड़ते हैं
या यों कहे तरकीब मोड़ते है
अनिल कुमार शर्मा
०३/०३/२०१६
और जागा हुआ झूठ
सिर्फ भावनाओं की लूट
सतह के ऊपर उठती हुई सतह
परत दर परत दफ़न हुई उम्मीद
सीने में कचोटते हुए से स्वप्न
अब कराहने भी नहीं देते
जहर जितना था
उससे भी जहरीली जिंदगी हो गयी
यह उम्मीद किस कदर खो गयी
अब तो शुद्ध आदमी और
अशुद्ध आदमी का चक्कर है
सिर्फ टक्कर है और टक्कर है
वो टकराते हैं हम पिस जाते है
हमें आटे की तरह सान कर खाते हैं
तमाम योजनाओं में पचाते हैं
गुल्लक में रेजगारी की तरह बचाते हैं
अपनी जरुरत पर फोड़ते हैं
अपना हिसाब जोड़ते हैं
या यों कहे तरकीब मोड़ते है
अनिल कुमार शर्मा
०३/०३/२०१६
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