Sunday, 14 February 2016

चलो हम भी मना लेते हैं
एक क़तरा प्यार का आज
नफरत भरे इस दौर में
एक लिजलिजी सी चीज है प्यार
सिर्फ भरोसे का व्यापार
मुझे डर लगता है इस कदर
महबूब तुझको लग जाये ना किसी की नज़र
ये गुलाब से खिले हुए दिल
कबूतर के जोड़ो से मिले हुए दिल
किसी वीरान में फड़फड़ाते है
एक हरे दरख्त के लिए तरस जाते है
जमींन से आसमान तक देखता हूँ
दिल के अरमान को फेंकता हूँ
प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ता हूँ
कई किताबो से लड़ता हूँ
बारी में प्रेम का ठौर तलाशता हूँ
हाट से प्यारा उपहार लाता हूँ
प्यार का यह दिन
बड़े प्यार से मनाता हूँ|
अनिल कुमार शर्मा
14/02/2016






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