व्यवहार के अनुरूप है
या आचार के अनुरूप है
या विचार के अनुरूप है
या बाजार के अनुरूप है
ये बता लोकतंत्र !
तेरा क्या सच्चा स्वरुप है
जमींन जो जितनी दिखती है
किस कदर कितनी टिकती है
और किस तरह कहाँ बिकती है
प्रश्न यह है कि हम तुम्हारे लायक बनें
या तुम हमारे लायक बनो
वीरान में किसी तम्बू की तरह तनो
मान लो मेरे देश तुझ पर कुर्बान हूँ
अपमान पीड़ित विचित्र स्वाभिमान हूँ
बाजार होते इस संसार में
ढल रही अब सरकार है
विचारधारा कितनी उदार है
सपने सट्टीबाज़ी में चढ़ रहे है
नयी व्यवस्था गढ़ रहे है
वे तो "मेक इन इंडिया" पढ़ रहे है
जब खेतों में डिजिटल फसलें उगेंगी
पानी भी नहीं मिलेगा जहाँ नौका डूबेगी
निवेश का दिन -दिन बढ़ता कटोरा
जनतंत्र वालों ने अब इतना बटोरा
दफ़न के लिए जमींन कम पड़ गयी
बिना कफ़न के लाश सड़ गयी
विकास का जहर सांसों में घुल रहा है
किसकी जिंदगी कैसे वसूल रहा है
लोकतंत्र तुम्हारे नशे में चूर हूँ
उदारीकरण के आगोश में भरपूर हूँ
मुद्दा तो है सबको सब कुछ मिलेगा
जो है वह सचमुच हिलेगा
अब तो परिवेश भी ठगा -ठगा सा है
दिल का चोर भी जगा -जगा सा है
जमींन कहीं गीली है तो कहीं सूख रही है
देश की कोई रगती नस दुःख रही है
यह बाजार हमारे लायक बने
या हम बाजार के लायक बनें
बता मेरे लोकतंत्र !
कितना जन -गण मंगलदायक बनें ।
अनिल कुमार शर्मा
12/02/2016
या आचार के अनुरूप है
या विचार के अनुरूप है
या बाजार के अनुरूप है
ये बता लोकतंत्र !
तेरा क्या सच्चा स्वरुप है
जमींन जो जितनी दिखती है
किस कदर कितनी टिकती है
और किस तरह कहाँ बिकती है
प्रश्न यह है कि हम तुम्हारे लायक बनें
या तुम हमारे लायक बनो
वीरान में किसी तम्बू की तरह तनो
मान लो मेरे देश तुझ पर कुर्बान हूँ
अपमान पीड़ित विचित्र स्वाभिमान हूँ
बाजार होते इस संसार में
ढल रही अब सरकार है
विचारधारा कितनी उदार है
सपने सट्टीबाज़ी में चढ़ रहे है
नयी व्यवस्था गढ़ रहे है
वे तो "मेक इन इंडिया" पढ़ रहे है
जब खेतों में डिजिटल फसलें उगेंगी
पानी भी नहीं मिलेगा जहाँ नौका डूबेगी
निवेश का दिन -दिन बढ़ता कटोरा
जनतंत्र वालों ने अब इतना बटोरा
दफ़न के लिए जमींन कम पड़ गयी
बिना कफ़न के लाश सड़ गयी
विकास का जहर सांसों में घुल रहा है
किसकी जिंदगी कैसे वसूल रहा है
लोकतंत्र तुम्हारे नशे में चूर हूँ
उदारीकरण के आगोश में भरपूर हूँ
मुद्दा तो है सबको सब कुछ मिलेगा
जो है वह सचमुच हिलेगा
अब तो परिवेश भी ठगा -ठगा सा है
दिल का चोर भी जगा -जगा सा है
जमींन कहीं गीली है तो कहीं सूख रही है
देश की कोई रगती नस दुःख रही है
यह बाजार हमारे लायक बने
या हम बाजार के लायक बनें
बता मेरे लोकतंत्र !
कितना जन -गण मंगलदायक बनें ।
अनिल कुमार शर्मा
12/02/2016
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