किसी दिन मैं आऊंगा उसी तरह
कि जैसे कोई जिंदगी आती है
किसी दिन चला जाऊँगा उसी तरह
कि जैसे कोई जिंदगी जाती है
क्या फर्क पड़ता इस दुनिया को
सुबह और रात के होने से
किसी के हँसने या रोने से
मैं तो एक हिलता हुआ पत्ता हूँ
हवाओं में बह जाऊंगा
खड़खड़ाते हुए कुछ कह जाऊंगा
इस अर्थहीन शोर के बीच
एक मुर्दा आवाज़ हूँ
टूटा हुआ एक साज़ हूँ
दिल के किसी कोने में
प्रेम का सम्राट हूँ
जिसकी नियत
किसी सूली पर टँगी है
ईसा , गांधी या सुकरात
की जिंदगी जैसी कुछ बनी है
मेरी धरती तूने क्या -क्या जनी है ।
अनिल कुमार शर्मा
14/03/2016
कि जैसे कोई जिंदगी आती है
किसी दिन चला जाऊँगा उसी तरह
कि जैसे कोई जिंदगी जाती है
क्या फर्क पड़ता इस दुनिया को
सुबह और रात के होने से
किसी के हँसने या रोने से
मैं तो एक हिलता हुआ पत्ता हूँ
हवाओं में बह जाऊंगा
खड़खड़ाते हुए कुछ कह जाऊंगा
इस अर्थहीन शोर के बीच
एक मुर्दा आवाज़ हूँ
टूटा हुआ एक साज़ हूँ
दिल के किसी कोने में
प्रेम का सम्राट हूँ
जिसकी नियत
किसी सूली पर टँगी है
ईसा , गांधी या सुकरात
की जिंदगी जैसी कुछ बनी है
मेरी धरती तूने क्या -क्या जनी है ।
अनिल कुमार शर्मा
14/03/2016
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