Sunday, 20 March 2016

तथागत !
मैं  वही दुःख हूँ
जिसे तूने जीवन कहा था
इच्छाओं की उठती गिरती तरंगों  में
आभासी जीवन की उमंगों में
सुख के बनते विधान में
चुपके से आ जाता हूँ
कोई न कोई जगह पा जाता हूँ
मुझसे  निजात पाने का जीवन भर  प्रयत्न
दर्शन के मूल में समायी है
अपनी जिंदगी क्यों इतनी परायी है
महल छोड़ कर जंगल जाना
सुजाता की खीर खाना
फिर मठों बिहारों में आना
बुद्ध धम्म और संघ बनाना
हर ब्यवस्था में कहीं न कहीं
कोई अन्तर्निहित अब्यवस्था छिपी है
शतरंज की चाल वैसे ही बिछी है
कुछ समय बीतने के साथ ही
चेहरे और मोहरे वही हो जाते हैं
जहाँ से  चले थे फिर वहीँ आते हैं
नए तर्क और विश्वास बनाते  है
खोजे गए सुख दुःख विमर्श को
नए दुःख के संधान में भुलाते हैं
बुद्धमं शरणम् धमम शरणम्
और संघम शरणम् जाते है
धम्म चक्र प्रवर्तन मानते हैं
अनिल कुमार शर्मा
20/03/2016



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