Sunday, 21 June 2015

ठगयोग अन्धकारिका 
यम नियम को गोली मारो
नहीँ नेति ,धौति ,वस्ति है
सत्ताभोगियों की यौगिक मस्ती है
सत्तासन से सिंघासन तक
घोटालासन से भ्रष्ट -आसन तक
वातानुकूलित कमरो में भ्रष्ट-अयाम करते हैं
सम्भोग से समाधि तक पढ़ते है
सम्भोग से ब्याधि में मरते है
चमचासन से नेतासन तक
दरिद्रमुद्रा से धनासन तक
धोखासन और ठगासन
जनता तुम्हें सिर्फ शवासन है
भ्रष्टभाँति भ्रष्टलोम विलोम
ठगबंधक्रिया ठगात्मक आचार 
विलासी जीवन नीच विचार
सत्तासुख के मधुरस भोगी हैं
योगी नहीं सब ठगयोगी हैं
अनिल कुमार शर्मा
२१/०६/२०१५

Thursday, 18 June 2015

I love you like  fresh morning breeze
Like gentle dew in the blooming bud
I intrude in  all the petals open
Suck the nectar like a hummingbird
Flowers and thorns of gloomy life
Enlighten me to proceed infinite
Where I suffer in nascent void
In this pathless tramps of vices
In the heap of desire and wishes
I love thee like arising sun of dawn
I hide you in the moon light night
In utter silence of dead night
I hear your speaking eyes
Curl of hair cheeks so fair
Pearls inside rosy lips
I blow in your nose respire
What is this cold fire?

Anil Kumar Sharma
19/06/2015





Tuesday, 16 June 2015

मेरी सुखी दिल्ली में
एक दुखी आदमी रहता है
वह आदमी के दुखों से दुखी है
थोड़ा बहुत जनतामुखी है
सत्ता उखाड़ू है
हाथ में झाड़ू है
कूड़े के ढेर पर
कुर्सी के मुंडेर पर
बन्दर की तरह उछलता है
बच्चे की तरह मचलता है
भ्रटाचार से हमें फुसलाया है
खुद उसी में समाया है
दूसरे की गिरेबान में झांकता है
अपना देखने में काँखता है
कोई सुराख़ ढांकता है
बहुत टोकता है
आँख में धूल झोंकता है
विचित्र पैगाम है
आदमी आम है
अनिल कुमार शर्मा
१७ / ०६ २०१५

Thursday, 11 June 2015

One day it is more to live
Or one day it is more to die
I have such a life
On edge of sharp knife
My muscles are frowning
My blood is boiling
I want to proceed in void
All my treasure devoid 
Such and such
More and much
I go in fancy
Of libido and nancy
I dig the tradition
Break the decision 
Come to profit and loss
We forever argue the toss
More I doubt less I believe 
One day it is more to live
Anil Kumar Sharma
12/06/2015

Saturday, 6 June 2015

कुछ तो है
यहाँ से दूर
सपनों में तो क्या
जिंदगी की खाक छानने से
अच्छा तो है सपनों में जी लेना
कुछ अमृत उम्मीदों की पी लेना
इस समुन्द्र मंथन का विष कौन पियेगा
महादेव की जिंदगी कौन जियेगा
सुर और असुर के बीच फंसा आदमी
ज़हर बोते हुए अमृत तलाश रहा है
खेतों की कीमत पर
निवेश रत्न तराश रहा है
क्योंकि ज़मीन पर सपने नहीं होते
आसमान के घर भी अपने नहीं होते
यह कैसा स्वप्नदाह है
ह्रदय से निकलता आह है
अनिल कुमार शर्मा
०७/०६ / २०१५

Tuesday, 2 June 2015

उसके चेहरे पर
एक हँसता हुआ दुःख
बार- बार उभरकर  आता है
दुःख का चेहरा भी
उस चेहरे को देखकर शर्माता है
अब तो लतीफाशाही की कद्र है
और उसे फ़िक्र हमारी है
क्योंकि हमें अपनी फ़िक्र नहीं आती
जिंदगी मौत को पिघलाती
आंकड़ों के अक्स दिखाती
कुछ अजीब नींद में सुलाती
ज़मीं से हटकर स्वप्न दिखाती
अब तो दर्द भी बिकने लगे है
बाजार में अजीब ख़रीददार दिखने लगे है
पैरों तले ज़मीन खिसक रही है
किसी के हिस्से की जिंदगी सिसक रही है
वह तो एक  अजीब दुनिया में भरमाता है
उसके चेहरे पर
एक हँसता हुआ दुःख
बार -बार उभरकर आता है
अनिल कुमार शर्मा
02 /06 /2015