Thursday, 29 May 2014

शून्यवाद
मैं अपने निहायत शून्य से परेशान हूँ
तुम एक के बाद नित्य प्रतिनित्य
एक दो शून्य रखते जा रहे हो
मैं सदा शून्यपति हूँ
तुम आज हजारपति हो
कल लखपति हो
परसों करोड़पति  हो
आगे अरबपति हो खरबपति हो
मैं शून्य में शून्य जोड़ता हूँ
शून्य में शून्य का गुड़ा भाग करता हूँ
शून्य से शून्य घटाता हूँ
बस सिर्फ शून्य और शून्य पाता हूँ
शून्य खाता हूँ शून्य पीता हूँ
शून्य जीता हूँ
तुम किसी संख्या के बाद
शून्य पर शून्य रखते जाते हो
मेरा शून्य झोपड़ी से हवा हो जाता है
तुम्हारा शून्य महल बनकर इतराता है
मै कहता हूँ ईश्वर शून्य है
तुम कहते हो ईश्वर किसी संख्या के बाद
अनन्त शून्यों की कतार है
सत्य यह है कि ----
मेरा भी शून्य झूठ है
तेरा भी शून्य झूठ है
किन्तु मेरे शून्य में विपन्नता है
तुम्हारे शून्य में सम्पन्नता है
तुम्हारा अनंत होता शून्यवाद
ब्रह्मवाद ,मायावाद ,बाज़ारवाद का उदारवाद
संख्याओ के मिश्रण से बड़ा प्रभावकारी है
मेरा विशुद्ध शून्यवाद शून्य होते हुए
एकदम शून्यकारी है
अनिल कुमार शर्मा  
३० /०५/२०१४/ ( कंगाल होता जनतंत्र से )

Tuesday, 27 May 2014

Morning sun and evening sun
My day starts and so done
Thus I live a day, an hour and a moment
On surf of time I surge  different
O my night throw some light
I am being deceived day by day
Let me console my torn heart
Lo I live a pleasing dearth
Anil Kumar Sharma   28/05/2014




गली के मोड़ पर दो कुत्ते भौक रहे थे
एक घूरे पर से आया था
दूसरा मंदिर के नाबदान से आया था
पहला मुर्गे की टाँग मुँह में दबाया था
दूसरा शिवाले का बहा दूध पी कर आया था
पहला खुद को सेक्युलर बताते हुए
दूसरे पर कम्युनल का आरोप लगाया था
दोनों आपस  में खूब भौंक रहे थे
शेष कुत्ते चौंक रहे थे
एक गधे के समझ में कुछ नहीं आया
वह बस रेंकने लगा
कुत्ता भौंकना  छोड़कर उसे देखने लगा
शेष कुत्ते समझ गए
गधा समझदार है
इसकी बातें वजनदार है
लगता है अभी यह सच्चा है
इन दोनों भौकने वालों से अच्छा है
शेष घबराये कुत्ते गधे पर चढ़ गए
गधे के साथ कुछ दूर तक बढ़ गए
यह देखकर और जानवर साथ आ गए
पूरे जंगल में छा गए
दोनों कुत्तो का विश्वास खा गए
गधा शिवाले की घास चर रहा है
अब समय गुजर रहा है

Sunday, 25 May 2014

अब अच्छे दिन आने वाले है
कौवे मोती खाने वाले है
एक जमूरा चला गया
नया मदारी आया है
कुछ सपने नया दिखाया है
शंकर जी के नगरी में
डुग -डुग डमरू बजाया है
काशी को आज सजाया है
देखो कौन लोग कुछ पाने वाले है
किसके अच्छे दिन आने वाले है
कौवे मोती खाने वाले है

Saturday, 24 May 2014

I read good morning and good night every day
But rarely happens such and occasionally nay
But friends I accede your auspicious tone
What could we do except expecting good
Love is better than we hate
Our endeavor  is better than our fate
This world is our to the extent we know
Otherwise this is a  mystery and foe
We know best in our  like and love
Paradoxes are beneath and above
We are swimming across limitless sea
Our life is limited desires are high
What we do , do and die.
Anil kumar Sharma 25/05/2014








Friday, 23 May 2014

बाहुबली

एक बाहुबली है
सुबह  मंदिर में घंटा बजाता है
देर शाम चकले में जाता है
दिन में पवित्र प्रसाद से लेकर
मदमदाते शराब में मस्त रहता है
भीरु जनता में ब्यस्त रहता है
माथे पर चन्दन टीका रोली है
जनेऊ में पिस्तौल और गोली है
उसके आलीशान महल में
शिव के  त्रिशूल  और गणेश के सूंड में
कारबाईन और राइफल टँगी है
तिजोरी के ऊपर राधाऔर त्रिभंगी  है
रामायण के ऊपर छूरा रखा है
हिंसा ने अहिंसा को चखा है
गाँधी की तस्वीर आईने में रखा है
बनियों से रंगदारी टैक्स लेता है
ठेकेदारों से जजिया और चौथ लेता है
सांसद और बिधायक को धौंस देता है
अफसरों को रौंद देता है
यही उसकी करतूत है
जनता अभिभूत है
उसके पास बुलेट प्रूफ गाड़ी है
कुर्ता , पायजामा ,सलवार और साड़ी है
टोपी और खड़ाऊ है
 बेलबूटा और जड़ाऊ है
चैरिटेबल ट्रस्ट और स्कूल है
एन जी ओ ,जिम ,स्वीमिंगपूल है
मंदिर ,मस्जिद ,गिरजे का आना -जाना है
उसके पास बड़ा कसाई खाना है
हर जगह से नोट बरसते है
उसकी कृपा कटाक्ष को सभी तरसते है
कानून व्यवस्था सब कुछ वही है
सबसे बली बाहुबली है
अनिल कुमार शर्मा         २३ /०५ /२०१४







Thursday, 22 May 2014

Live Foul and fair

My life and death
My love and hate
My blood and bone
My words and tone
I am composed of  these all
These are my rise and fall
I emerge different of all
Where I differ to me
All that I see
I am enemy of me
This is my defense
A serious offense
I am committed to life
But life is not committed to me
I breathe the air
Live foul and fair.
Anil kumar Sharma

Wednesday, 21 May 2014

कुछ सवाल खुश्नुमे थे
अब कुछ जबाब खुश्नुमे  है
जो फूल टहनी पर लगे थे
उनके हार भी खुश्नुमे है
फूल तो खिल गया
कली मुरझा गयी
उम्मीद में उम्मीद खा गयी
रोशनी इतनी तेज है
जहाँ कुछ दिखाई नहीं देता
आशीर्वाद के दौर में
दुखड़ा सुनाई नहीं देता
पानी में पानी मिलाते हुए
पानी का रंग दिखाई नहीं देता
हमें उनकी फ़िक्र ज्यादा है
जिन्हें फ़िक्र करने आता ही नहीं
समझ के दायरे में इसे 
कोई  समझ पता ही नहीं
जंगल वही है बस शेर दूसरा है
अब देखना है
कितना खोटा है
कितना खरा है
अब इस दौर में
कितना सूखा है कितना हरा है
अनिल कुमार शर्मा 22 /05 /2014

Thursday, 8 May 2014

जिसने लोकतंत्र कमा लिया   
अब तो सवाल यहाँ खड़ा है
जन प्रतिनिधि का भ्रस्ट होना
और जनता का वोट देना
दोनों बराबर है
किन्तु यहाँ एक के सिर पर दोष है
बाकी निर्दोष हैं
सत्ता के सवाल पर
जनता और नेता चुप हैं
स्वरुप विद्रूप है
वोट देने और लेने का लोकतंत्र है
नयी सोच का यही नया मन्त्र है
अब तो पार्टी का वोट बैंक होता है
और नेता का स्विस बैंक होता है
विकास के बजट मे घोटाले है
जिन्हे बड़ी ईमानदारी से हम वोट डाले है
सरकार निजी निगम के दबाव मे है
जनता अपने जातिगत स्वभाव मे है
यह मूल्य -हीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बन्द पूंजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा मे खाँस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है
बिककर खबर पाट रही है
अब तो एक छोटे से कमर्शियल ब्रेक के बाद
एक बहुत बड़ा बलात्कार होता है
मीडिया में इसी तरह का चमत्कार होता है
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है
जहाँ बाघ के पीठ पर बकरी रख दी जाती है
बाघ गुर्राता है बकरी मिमियाती है
वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाती है
एक सीना फाड़कर खून पीता है
एक हरी पत्ती और हरी घास खाती है
यही जनता द्वारा जनता के लिये
जनता की सरकार कहलाती है
संवाद मे मीडिया है
बाजार की इनसाइक्लोपीडिया है
एक लड़की कपड़ा उतार कर
कपड़े का प्रचार कर रही है
पूंजी के पार्क मे मीडिया पहनकर गुजर रही है
सब मूल्य और तर्क तोड़कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज़ चैनलो मे हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आंख से नंगा है
खबर यही है कि कोई खबर नहीं है
मंत्री जेल मे है मल्टीनेशनल अपने खेल मे है
मीडिया एग्जिट पोल कराती है
वही जाने क्यों इस तरह की हवा बनाती है
सरकार पकाती है सरकार खाती है
लगता है जमाना एक चश्में मे अंधा है
इसी लिए चमक रहा यह धंधा है
तिकड़म तो बस यही है
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोपड़ी से महल बना लिया !
अनिल कुमार शर्मा

Tuesday, 6 May 2014

भद्र -मॉडल

उसके पास पीड़ा का फीता है

अलग -अलग साइज के पीड़ा को नापता है

और उसका कुर्ता -पायजामा सिल देता है

एक दिन मैंने देखा ---
वह कुर्ता सिल रहा था
शरीर के महत्वपूर्ण स्थानों पर कपडे गायब थे
मैंने पूछा -----
वह कौन ऐसा पीड़ित व्यक्ति है
जो ढकने वाली जगह को उघरना चाहता है
सदियों की गलती को सुधारना चाहता है
उसने कहा ---
इसने नंगे भूखों की फसल को खाया है
पीड़ा निचोड़कर नहाया है
इसकी सुदर्शनीय आकार की
एक कंपनी से संविदा है
जो अंतःवस्त्रों की बिक्री पर फ़िदा है
मखमली संस्कारों मे पली है
आज के मार्केट मे ढली है
उसी का यह वस्त्र है
एड -मार्केट का शस्त्र है
नंगे शीर्ष पर जाने को पागल है
अपने घर की भद्र -मॉडल है ।
अनिल कुमार शर्मा    05/05/2014