Monday, 26 February 2018

जब कभी मेरा मुझसे सामना होता है
जाने क्यों मन अनमना होता है
बाहरी विस्तार में फट गया हूँ
भीतर भी ज्यादा सिमट गया हूँ
उजालों की ये रंगीनियां हैं
अंधेरों की  ग़मगीनियाँ हैं
सितारे माहताब  बनना  चाहते हैं
जुगुनू आफताब  बनना  चाहते हैं
जेब में  धरती और मुट्ठी में
सारा आसमान करना चाहते है
पूंजी की तरह पसर कर
 अजीब संसार होना चाहते है
लटकने इस कदर  लटक रही हैं
जैसे पूरी दुनिया गटक रही हैं
अस्तित्व के छिलके बिखरे पड़े हैं
चेतना के स्वर किस कदर सड़े हैं
रोज मरी हुई जिंदगी जी रहे हैं
व्यवस्था की दरिंदगी पी रहे हैं
खुद से हट कर खुद को छुपा रहा हूँ
दोस्त अपनी बेखुदी दिखा रहा हूँ
क्यों इस ढोंग को थामना होता है ?
जब कभी मेरा मुझसे सामना होता है
जाने क्यों मन अनमना होता है |
अनिल कुमार शर्मा
26/02/2018

Thursday, 22 February 2018

गांव वाले मेरा गांव पूछते हैं
शहर वाले मेरा शहर पूछते हैं
जाति वाले मेरी जाति पूछते हैं
धर्म वाले मेरा धर्म पूछते हैं
देश वाले मेरा देश पूछते हैं
प्रदेश वाले मेरा प्रदेश पूछते हैं
राष्ट्र वाले मेरा राष्ट्र पूछते हैं
खुदा वाले मेरा खुदा पूछते हैं
पार्टी वाले मेरी पार्टी पूछते हैं
विचारधारा वाले मेरी विचारधारा पूछते हैं
यूँ ही बहने वाले किनारा पूछते हैं
दोस्त तुम तो सिर्फ हाल -चाल पूछते हो
कभी -कभी मेरा खयाल पूछते हो
तबियत वाले मेरी तबियत पूछते है
खैरियत वाले मेरी खैरियत पूछते हैं
कभी -कभी आदमी की शक्ल में
कुछ लोग मेरी आदमियत पूछते हैं
एक आदमी के ऊपर पहचान के
परत दर परत इतने चढ़ते जाते हैं
कि वह आदमियत शून्य ढांचे की तरह
कई लबादों में ढक जाता है
पहचान के इन्ही खंडहरों  में छटपटाता है
इसी में वह जीतता है हारता है
अपने भीतर के आदमी को
कई तरीके से मारता है
समस्या विकट है
इस दौर का यही संकट है
सत्य का अजीब पाखंड है
यह कौन सा कालखण्ड है ?
अनिल कुमार शर्मा
२२/०२/२०१८



Wednesday, 21 February 2018

देश पूरी धरती पर
एक धरती का टुकड़ा है
जिस पर लोग रहते है
इसे अपना -अपना राष्ट्र  कहते हैं
इस पर रोज मान और अपमान सहते हैं
इसके लिए कितनों के खून बहते हैं
देश एक संपृक्त भावना है
जिसमें  सद्भावना और दुर्भावना है
अशक्तों पर सशक्तों की स्थापना है
संविधान में एकता की संभावना है
जनता  है सरकार है
न्याय का दरबार है
कानूनों की भरमार है
विधायिका अपरम्पार है
कार्यपालिका में भ्रष्टाचार है
न्यायपालिका में जुगाड़ है
मिडिया का  रोजी -रोजगार है
देश की सीमा के बाद
कई दूसरे देश हैं
जहाँ सीमा का विवाद है
इसमे भीतरी और बाहरी खतरे हैं
कोई आबाद तो कोई बर्बाद है 
देश से पहले और देश के बाद
हमेशा कोई न कोई देश है
जिसमे हजारों सन्देश हैं
इसीमे देशप्रेमी और देशद्रोही हैं
सत्ताभक्त और विद्रोही हैं
सभी पर इस मिट्टी का क़र्ज़ है
देशप्रेम एक पवित्र फ़र्ज़ है
अनिल कुमार शर्मा
२१/०२/२०१८