Sunday, 21 May 2017

बादल को देखता हूँ
किन्तु बादल में नहीं हूँ
यह ज़मीन करवट लेती है
और ऊंट पहाड़ के नीचे आता है
कभी कभी ऐसा भी होता है
मियां की जूती मियाँ के सर
असरदार बात हो जाती बेअसर
माहौल जाता एकदम पसर
कामयाब होती नाकामयाबी
हक़ीक़त हो जाती ख्वाबी
अब तो वह ख्वाब देखता  है
बाजार का इंकलाब बेचता है
बात खिलाता है बात पिलाता है
सिर्फ बात को बात में जिलाता है
बेहयाई की हद तक नाकामयाबी मनाता है
हम इस तिलिस्म में भूले हुए लोग है
नमक की हाड़ी की तरह गले हुए लोग है
पत्थर खाने के बन गए अब  संजोग हैं
इस मशीन के हम  उपभोक्ता और उपभोग है
विकासधन्धियों के विकसित उद्योग हैं |
अनिल कुमार शर्मा
२१/०५/२०१७





Saturday, 13 May 2017

वह जो गोद में दूध पिलाते हुए
चूल्हे के आगे रोटी बनाती है
एक हाथ से  बच्चे को खिलाती है
दूसरे हाथ से सब्जी चलाती है
वह माँ है जो घर को चलाती है
गिरते हुए बच्चे को उठाती है
सहलाती है दुलराती है
जगाती है सुलाती है
लोरी और कहानी सुनाती है
जवानी और बुढ़ापे को माँ
तुम्हारी याद बचपन बनाती है
मेरे लिए कितने मन्नते मनाती है
किसी की नज़र न लगे
आँचल में छुपाती है
इस नन्ही सी दुनिया में
मेरी माँ ही अरमान सजाती है
रिस्ते बहुत से बनेगे बिगड़ जायेंगे
किन्तु माँ हम तुम्हारे पास ही आएंगे
तुम्हारे आँचल से बिछड़ कर कहाँ जायेंगे |
अनिल कुमार शर्मा
१४/०५/२०१७



Sunday, 7 May 2017

वह तोड़ता भूत
जोड़ता भविष्य
फोड़ता वर्तमान
जिसे मैंने देखा
कचहरी के पथ पर
चीथड़ों के साम्राज्य पर
गर्दिश में खोयी किस्मत के बीच
पिजड़े में बैठा तोता
किसी  का भाग्य विधाता होता
गत्ते के ढ़ेर में उलझे हुए भाग्य लेख
उलझती हुई जिंदगी को देख
समाधान के पक्ष विपक्ष
कर देते किंकर्तव्यविमूढ़
ग्रह - नक्षत्रों के चक्रव्यूह में फंसा जीव
शायद ही कोई निजात पाता है
तोता पिजड़े से बाहर आता है
भाग्य के लेख को चोंच से उठाता है
भविष्यदर्शी उसे बाँचता है
स्लेट पर आड़ी -तिरछी रेखाएं खांचता है
अंगुली पर कुछ गिनता है
दो चार अंगूठी बीनता है
राहु केतू शनि को भगाता है
बजरंगबली को जगाता है
किस्मत के बाद बची कचहरी है
सबूत और गवाही में बुद्धि हरी है
अब तो घुन पिसता है
बच जाता जौ साबूत
वह तोड़ता भूत |
@ अनिल कुमार शर्मा
हास्य दिवस पर अप्रेम
07/04/2017



                                     ग़ज़ल
सुबह   हो गयी    मग़र     रात     अभी  बाक़ी है |
इस रोशनी में अब कोई साज़िश झिलमिलाती है | |
सूरज     बहकता     सा   चाँदनी   मुस्कुराती है |
हवा का रुख बताने में पत्तियां लड़खड़ाती हैं | |
धुँवा इस कदर  पसरा        आंखें डबडबाती हैं |
दीया बुझा -बुझा सा  जली -जली सी बाती है | |
इस तरह सजी ज़िन्दगी जिन्दगी को ऊबाती है |
रंगीन अंधेरों में गुम रोशनी नहीं टिमटिमाती है | |
लाज बिक गयी अब   बाजार नहीं    लजाती है |
टूटे घरों की ख्वाहिशें ये ग़ज़ल क्यों सजाती है | |
दिन के अँधेरों को सारी रात जगकर काटी है |
सुबह हो गयी मग़र      रात   अभी   बाक़ी है | |
@ अनिल कुमार शर्मा
07/05/2017