बादल को देखता हूँ
किन्तु बादल में नहीं हूँ
यह ज़मीन करवट लेती है
और ऊंट पहाड़ के नीचे आता है
कभी कभी ऐसा भी होता है
मियां की जूती मियाँ के सर
असरदार बात हो जाती बेअसर
माहौल जाता एकदम पसर
कामयाब होती नाकामयाबी
हक़ीक़त हो जाती ख्वाबी
अब तो वह ख्वाब देखता है
बाजार का इंकलाब बेचता है
बात खिलाता है बात पिलाता है
सिर्फ बात को बात में जिलाता है
बेहयाई की हद तक नाकामयाबी मनाता है
हम इस तिलिस्म में भूले हुए लोग है
नमक की हाड़ी की तरह गले हुए लोग है
पत्थर खाने के बन गए अब संजोग हैं
इस मशीन के हम उपभोक्ता और उपभोग है
विकासधन्धियों के विकसित उद्योग हैं |
अनिल कुमार शर्मा
२१/०५/२०१७
किन्तु बादल में नहीं हूँ
यह ज़मीन करवट लेती है
और ऊंट पहाड़ के नीचे आता है
कभी कभी ऐसा भी होता है
मियां की जूती मियाँ के सर
असरदार बात हो जाती बेअसर
माहौल जाता एकदम पसर
कामयाब होती नाकामयाबी
हक़ीक़त हो जाती ख्वाबी
अब तो वह ख्वाब देखता है
बाजार का इंकलाब बेचता है
बात खिलाता है बात पिलाता है
सिर्फ बात को बात में जिलाता है
बेहयाई की हद तक नाकामयाबी मनाता है
हम इस तिलिस्म में भूले हुए लोग है
नमक की हाड़ी की तरह गले हुए लोग है
पत्थर खाने के बन गए अब संजोग हैं
इस मशीन के हम उपभोक्ता और उपभोग है
विकासधन्धियों के विकसित उद्योग हैं |
अनिल कुमार शर्मा
२१/०५/२०१७