Friday, 25 November 2016

विवेकी राय को श्रद्धांजलि 
सोनामाटी के मनबोध मास्टर !
क्या लोकऋण चुका दिए ?
दिवंगत युग की स्मृतियों के स्वेदपत्र
नयी कोयल की जीवन परिधि में
गूँगा जहाज जैसे जीवन का अज्ञात गणित है
कालातीत होकर अभी समर शेष है
वन तुलसी की गंध अवशेष है 
देहरी के पार अब जुलूस रूका है
गंवई गंध गुलाब से गुजरते हुए
पुरूषपुराण क्यों बबूल के पक्ष में झुका है
चित्रकूट के घाट पर आम रास्ता नहीं है
 लोक जीवन की तुझ जैसी कोई और दास्ताँ नहीं है
भाषा के अहरे पर फुटेहरी जैसी सिंकी हुई
कई विधाओ की ज्योनार तुम्हारे सिवान में मिल जाती है
 चली फगुनहट बौरे आम तबियत खिल जाती है
अंचल को ही अपना जगत तपोवन सो कियो
टुकरा मिले बहुरिया घाट घाट का पानी पियो
रात के सन्नाटे बेकार दिनों के उजास
रचना में लोकभाषा की पनही पहनकर चलते हैं
तत्सम तद्भव मिलकर भदेस से कुछ कहते हैं
 समझ का प्रयोग कर  भी फिर बैतलवा डाल पर रहते हैं
नमामि ग्रामम के लोग भी बेटे  बिक्री करते हैं
ऊसर के रेह में सौन्दर्य तलाशते हुए
 पगडण्डी  की भाषा को सड़क से बचाते हुए
कोई नया गाँवनामा  रच  रहे थे
उम्र की दहलीज पर थके ह्रदय से
पुत्रशोक में  टूटे हुए आदमी से हटकर
 जीवन और प्राण के अंतराल में
अक्षुण यशो राशि पर आरूढ़
रचना पथ के अविराम पथिक
नवोदित लेखको की करते नेकी
श्रद्धांजलि है तुझे राय विवेकी ।
अनिल कुमार शर्मा
२५/११/२०१६








Thursday, 24 November 2016

                                                             

                                                                    कविता में जनतंत्र 
                                                                                                             डॉ ०  वेद प्रकाश अमिताभ 
                                                                                      हिंदी विभाग , अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय 
        समकालीनता की प्रमुखता  उसमें  निहित व्यवस्था -विरोध की हिम्मत है । अनेक रचनाओं के शीर्षक गवाह हैं कि समकालीन सर्जक  मौजूदा जनतांत्रिक व्यवस्था में जनाकांक्षाओं के हनन को लेकर चिंतित रहे हैं। ठिठुरता हुआ गणतंत्र (हरिशंकर परसाई ), ' डेमोक्रेसी के भगवान '(यज्ञ शर्मा ),'मन चलता है लोकतंत्र में '(गोपाल बाबू शर्मा ),'  गणतंत्र सिसक रहा है '(सुधीर ओखदे ) आदि की ही श्रृंख़ला में ही अनिल कुमार शर्मा का कविता -संग्रह- ' कंगाल होता जनतंत्र ' भी उल्लेखनीय है । इस संग्रह में श्री शर्मा एक समय-सजग  कवि के रूप में प्रभावित करते है । जनता के द्वारा जनता के लिए निर्मित हर तंत्र में सामान्यजन की दुर्गति सर्वाधिक द्रष्ट्रव्य है । कवि ने मजदूरों -किसानों , वंचितों ,उत्पीड़ितों के दुःख -दर्द पर बराबर दृष्टि केंद्रित रखी है । 'मजदूर किसान बेहद लाचार है ', जी तोड़ मेहनत के बाद भी जिनके पेट रह जाते है खाली ', पेट के सवाल पर क़र्ज़  ब्याज में डूबे हो ' आदि  से कवि की यथार्थ चेतना और पक्षधरता स्पष्ट है । कोढ़ में खाज़ यह है कि नई उदार नीति और भूमंडलीकरण से उपजे बाज़ारवाद ने भी श्रमजीवियों को ही छला है । इसलिए संग्रह की शीर्षक  कविता में जिस निष्कर्ष पर कवि पहुँचता है , वह यथार्थ से पुष्ट है - 'विदेशी पूंजी से छलकते हुए समृद्धि की हवाओं से कंगाल होता जनतंत्र हूँ '। 'जिसने लोकतंत्र कमा लिया ' कविता में मूल्यहीन अर्थव्यवस्था से पोषित लोकतंत्र की विडम्बना इन शब्दों में उजागर हुई है - ' यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है /  जहाँ जगह की सहूलियत के लिए बाघ की पीठ पर बकरी रख दी जाती है /'। कवि को प्रतिवाद और प्रातिरोध के स्वर भी सुनाई देते है , लेकिन वे सबल और कारगर नहीं हैं ।
          अपनी जनधर्मी और समाजबोधी अंर्तवस्तु को संप्रेषणीय बनाने के लिए शर्मा ने जो भाषा चुनी और बुनी है ,  वह यथार्थपरक और प्रभावोत्पादक है , उनके काव्य -बिम्ब ,संवेदना और विचार को उभारने में सर्वथा सक्षम हैं । 'भिखमंगे के कटोरे ','आशा की खूँटी ', 'आस्था की सफेदी ','ग्लोबलिज़शन की थाली ', ' तेजाब का काजल ', 'आधुनिकता की पटरी ' आदि विडम्बनाओं - कुरूपताओं की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति में सफल है । यथार्थ में गहरे धँसी और छटपटाती इन कविताओ से गुजरना विचारोत्तेजक अनुभव है ।                                                                                                          ( गाज़ीपुर समाचार :१६ नवम्बर २०१५ से २२ नवम्बर से साभार )


Saturday, 19 November 2016

एक देश में कई देश देखा
लाइन में खड़ा दरवेश देखा
जड़ खोदकर फल इतरा रहा है
किसकी ज़मीन खा रहा है
भस्मासुर गा रहा है
गंगाजल बेचकर
नमामि गंगे गा रहा है
लक्ष्मी के दरबार में
श्रीहीनता का दौर है
दिवंगत धन के बोझ से
निजात पा कर पेट खाली है
दुरभिसंधि की जुगाली है
देश में खड़ी भूखी भीड़ को
कोई अजूबा देश दिखा रहा है
वह तो देश के लिए ही
पोशाक बदलते हुए जी रहा है
हमें देश के लिए दरिद्र हो कर
लाइन में मरना सिखा रहा है
उसकी हर बात में अपना देश आता है
आंख में धूल झोंककर
कोई अजीब विकास दिखाता  है
अपनी अपनी डफली
अपना अपना राग बजाता है
अनिल कुमार शर्मा
१९/११ /२०१६


Wednesday, 9 November 2016

लाल बुझक्कड़ की सरकार में
सनसनी ही सनसनी हो रही है
जनता में जनता का ही हिस्सा है
और उस हिस्से का कोई किस्सा है
बासी अख़बारों की तरह योजनाएँ
रोज काले चश्मों से पढ़ी जाती हैं
समाधान भी विचित्र गढ़ी जाती है
पेट की आग पर पूंजी पक रही है
बटलोई में कोई राज ढक रही है
जो तिजोरी में बंद है वह सफ़ेद है
जेब से जो बच गया वह  काला है
उसी पर तो चल रहा बर्छी भाला है
नज़र में अब तो बेचारी लहरें है
गहरे समंदरों पनडुब्बियां सुरक्षित है
झोपड़ियों के उड़ाने के विधान में
हवेलियाँ तो सदा संरक्षित हैं
बिकी हुई सहानुभूतियों को पढ़ते हुए
न बिकने वाला एक दर्द उभर आता है
रंगीन रोशनी में  कुछ यूं ही छटपटाता है
विशुद्ध रोशनी की तलाश में गुम हो जाता है
अब ज़मीनी हक़ीक़त कहाँ खो रही है
लाल बुझक्कड़ की सरकार में
सनसनी ही सनसनी हो रही है ।
अनिल कुमार शर्मा
09/11/2016



Tuesday, 8 November 2016

 वह यही था सच जो
युगों के ज्ञान के इलाके में
बुद्धि के उबड़ -खाबड़ पगडंडियो पर
चलता हुआ अँधेरे से उजाले की ओर
और वह उजाला भी युगान्त के बाद
बने मठों के अँधेरे में ढलता गया
जैसे तेज आँखों में मोतियाबिन्द हो गया हो
खुद के परदे में  समूचा दृश्य खो  गया हो
पर्दा हिलता है  तो लगता है संस्कृति हिल रही है
बनायी हुई शुद्धता में कोई अशुद्धि मिल रही है
 यही घोंघे की घोंघे में स्वघोषित क्रान्ति है
विचित्र ज्ञान के चमक की भ्रान्ति है
प्रकृति के विरोध में  उगी पवित्रता की धुंध में
ज्ञान और विज्ञानं के  निर्बाध अन्धाधुन्ध में
बाजार बनते धर्म और विज्ञानं की उपलब्धियाँ
मानव के उपभोक्ता होने तक सिमित है
विज्ञापनों में अवतार उत्पादों पर चिपके है
गुरूजी भी विचित्र संदिग्धता में लिपटे हैं
आस्था और बाजार का घाल मेल है
महर्षि भी बेचता कडुवा तेल है
हे भगवान यह कैसा खेल है ।
अनिल कुमार शर्मा
08/11/2016