Tuesday, 22 September 2015

कुछ छिपे हुए शब्द
और कुछ छिपे हुए रिश्ते
निकल  आते है कभी -कभी
अजनबी चेहरों में भी
अपने धड़कते दिलों की तरह
अजीज लगने लगते है ये  लोग
खुद के रिश्तों से बढ़कर
कुछ तार ऐसे जुड़ जाते है
बिना किसी उम्मीद के
बेचैन हो जाता हूँ
क्यों और किसलिए नहीं जनता
रिश्तों की गहराइयों को
सिर्फ डूबने के सिवा ।
अनिल कुमार शर्मा
22/09/2015

Thursday, 17 September 2015

दिवस की  इस हिंदी में
पुरस्कृत हिंदी और तिरस्कृत हिंदी
दोनों अजीब तरह से  परेशान है
किसी का सम्मान है तो  किसी का अपमान है
किसी के लिए सिर्फ  दारू और जलपान है
हिंदी लिखी जाती है पढ़ी जाती है
असल में यह गढ़ी जाती है
कई फ्रेमों में मढ़ी जाती है
जनता की हिंदी और हिन्दीवाले की हिंदी
में एक अजीब सा अंतर है
पुरस्कृत और तिरस्कृत निरंतर है
इसमें पहली और दूसरी परम्परा है
कही विरान  है तो कही हरा भरा है
कोई खुश तो कोई जरा -मरा है
कहते है हिंदी में एक जूता है
 जो उसे  चाटता है
पुरस्कार काटता है
अब तो हिंदी मनाई जाती है
जैसे कई बच्चों की माँ हर साल
दुल्हन बनायीं जाती है
हिंदी तुम्हारी यही छवि है
कविता से ज्यादा परेशान कवि है ।
अनिल कुमार शर्मा
17/09/2015




Wednesday, 16 September 2015

चलो शुरू करते है
अब यही से जिंदगी
जीतनी बच गयी है
अपने हाथों में
बहुत कुछ छूट गया होगा
बहुत कुछ लूट गया होगा
अपने अरमानों की थाती संजोये
वो आदमी टूट गया होगा
अब तक जो घुटन थी
दिल की जो टूटन थी
डाल  से टूटे फलों की तरह
बिखरकर फिर से जमना होगा
उजड़े चमन में फिर से बनना होगा
मैं टूट चूका हूँ इस कदर
अपनी पुरानी ख्वाहिशों में
अब नज़र के दायरे बंद हो गए है इतने 
नयी ज़मीनें नज़र में नहीं आतीं
बची हुई जिंदगी शून्य में छटपटाती
इस निहायत शून्य को भरना होगा
अब खुद  में संवरना होगा ।
अनिल कुमार शर्मा
17/09/2015

Friday, 11 September 2015

वही उदास चेहरों के
अब  उदास सवाल
खिले चेहरों पर
कुछ ज्यादा   खिलने लगे है
हानि -लाभ फिर से मिलने लगे है
सबके काले चिट्ठे तो
अब एकदम सफ़ेद है
सिर्फ हमारे और उनके में भेद है
लाभ तो सदा  उनका है
सिर्फ घाटा हमारा है
ठिठुरते हुए माहौल में
चढ़ता हुआ पारा है
एक कशिश थी दोस्त !
हमारे और तुम्हारे दिलों में
सबका कल एकदिन बेहतर होगा
वह आने वाला कल
किसी अँधेरे खोह में खो गया
लगता है जो होना था हो गया
फिर भी कहीं न कहीं
एक  टींस जिन्दा है
जिसमे उम्मीद का
एक फड़फड़ाता परिंदा है
मेरे दोस्त यही एक उम्मीद है
जो किसी तरह जिन्दा है
अनिल कुमार शर्मा
12/09/2015