लाल रंग में जितनी सफेदी है
उतने आप हमारे है
विशुद्ध चिंतन के आयाम
दर्द और आह्लाद से परे
शुचिता के केंद्र में
अंतहीन सुनिश्चित प्रवाह में
बदलते शब्दार्थ के प्रतीक बिम्ब
अर्थ के बाद भी अर्थ की आवृत्तियाँ
उत्तर के बाद भी उत्तर की तलाश में
पुनः प्रश्न बनकर खड़ा है
चिंतन की चिंतन धारा
प्रश्न उत्तर ,उत्तर फिर प्रश्न
मुखर प्रतिवाद मूक संवाद
गंभीर प्रश्न सुमेरु पर
आच्छादित्त धुंध में
तलाश है एक प्रकाश बिंदु की
तलाशना ही जिसकी सार्थकता है
इन्ही प्रश्न चिन्हों पर प्रश्न उठाते हुए
उत्तर पुनः प्रश्न बन जाते है
प्रारम्भ और अंत के मध्य
अवशेष का सृजन
पुनः वही प्रारम्भ और अंत है
जो अपनी परिणति में अवशेष रह जाता है
युग की संवेदना में जिसे ढूंढते हुए
रिक्त फलक पर शून्य का हस्ताक्षर
तमाम रंगो की जटिलता में
दृष्टिगोचर हो रहा है
विचारबद्ध उत्तर की पृष्टभूमि पर
पुनः प्रश्न बन कर खड़ा हूँ
शव साधना का नया अर्थ विस्तार
क्या आने वाले युग का उत्तर बन सकेगा ?
काल वंचित अवशेष की व्याख्या में
काल कवलित परिभाषाओं के दायरे
क्या दे पाएंगे अवशेष प्रश्नों के उत्तर ?
बिम्ब को तोड़ते हुए बिम्ब
प्रश्न उत्तर की तरह सामानांतर खड़े है
मध्य के व्याख्यान में अतीत होते हुए
हम और आप पड़े है
अनिल कुमार शर्मा २८/११/२०१४/
उतने आप हमारे है
विशुद्ध चिंतन के आयाम
दर्द और आह्लाद से परे
शुचिता के केंद्र में
अंतहीन सुनिश्चित प्रवाह में
बदलते शब्दार्थ के प्रतीक बिम्ब
अर्थ के बाद भी अर्थ की आवृत्तियाँ
उत्तर के बाद भी उत्तर की तलाश में
पुनः प्रश्न बनकर खड़ा है
चिंतन की चिंतन धारा
प्रश्न उत्तर ,उत्तर फिर प्रश्न
मुखर प्रतिवाद मूक संवाद
गंभीर प्रश्न सुमेरु पर
आच्छादित्त धुंध में
तलाश है एक प्रकाश बिंदु की
तलाशना ही जिसकी सार्थकता है
इन्ही प्रश्न चिन्हों पर प्रश्न उठाते हुए
उत्तर पुनः प्रश्न बन जाते है
प्रारम्भ और अंत के मध्य
अवशेष का सृजन
पुनः वही प्रारम्भ और अंत है
जो अपनी परिणति में अवशेष रह जाता है
युग की संवेदना में जिसे ढूंढते हुए
रिक्त फलक पर शून्य का हस्ताक्षर
तमाम रंगो की जटिलता में
दृष्टिगोचर हो रहा है
विचारबद्ध उत्तर की पृष्टभूमि पर
पुनः प्रश्न बन कर खड़ा हूँ
शव साधना का नया अर्थ विस्तार
क्या आने वाले युग का उत्तर बन सकेगा ?
काल वंचित अवशेष की व्याख्या में
काल कवलित परिभाषाओं के दायरे
क्या दे पाएंगे अवशेष प्रश्नों के उत्तर ?
बिम्ब को तोड़ते हुए बिम्ब
प्रश्न उत्तर की तरह सामानांतर खड़े है
मध्य के व्याख्यान में अतीत होते हुए
हम और आप पड़े है
अनिल कुमार शर्मा २८/११/२०१४/