Friday, 28 November 2014

लाल रंग में जितनी सफेदी है
उतने आप हमारे है
विशुद्ध चिंतन के आयाम
दर्द और आह्लाद से परे
शुचिता के केंद्र में
अंतहीन सुनिश्चित प्रवाह में
बदलते शब्दार्थ के प्रतीक बिम्ब
अर्थ के बाद भी अर्थ की आवृत्तियाँ
उत्तर के बाद भी उत्तर की तलाश में
पुनः प्रश्न बनकर खड़ा है
चिंतन की चिंतन धारा
प्रश्न उत्तर ,उत्तर फिर प्रश्न
मुखर प्रतिवाद मूक संवाद
गंभीर प्रश्न सुमेरु पर
आच्छादित्त धुंध में
तलाश है एक प्रकाश बिंदु की
तलाशना ही जिसकी सार्थकता है
इन्ही प्रश्न चिन्हों पर प्रश्न उठाते हुए
उत्तर पुनः प्रश्न बन जाते है
प्रारम्भ और अंत के मध्य
अवशेष का सृजन
पुनः वही प्रारम्भ और अंत है
जो अपनी परिणति में अवशेष रह जाता है
युग की संवेदना में जिसे ढूंढते हुए
रिक्त फलक पर शून्य का  हस्ताक्षर
तमाम रंगो की जटिलता में
दृष्टिगोचर हो रहा है
विचारबद्ध उत्तर की पृष्टभूमि पर
पुनः प्रश्न बन कर खड़ा हूँ
शव साधना का नया अर्थ विस्तार
क्या आने वाले युग का उत्तर बन सकेगा ?
काल वंचित अवशेष की व्याख्या में
काल कवलित परिभाषाओं के दायरे
क्या दे पाएंगे अवशेष प्रश्नों के उत्तर ?
बिम्ब को तोड़ते हुए बिम्ब
प्रश्न उत्तर की तरह सामानांतर खड़े है
मध्य के व्याख्यान में अतीत होते हुए
हम और आप पड़े है
अनिल कुमार शर्मा  २८/११/२०१४/


Saturday, 22 November 2014

अब तो  अजीब संत है
जो समस्या अनंत है
भगवान टोकरी में है बोरे में है
भक्त अन्धविश्वास के डोरे में है
बहुत कुछ पाखंड में पगे
सद्वचन के ढिढोंरे में है
सद्वाक्य ओढ़ कर कसाई
भेड़ पालता है
उसे जबह करने के लिए
उपदेश भरा चारा डालता है
झाशाराम है ठगीशंकर है
बम है बन्दुक है बंकर है
व्याख्या में आदिगुरु कोई शंकर है
ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या है
शिष्य से ज्यादा शिष्या है
विलासिता में सजी तपस्या है
अब गुरुघंटाल कानून से ऊपर है
यह तकनीकी बड़ी सुपर है
जनता भक्त है
बाबा और नेता के आगे
अशक्त है
भगवान बेचनेवाले
सत्ता से सशक्त है
मार खाते भोले भाले भक्त है
पाखंड से धर्म अशक्त है
अनिल कुमार शर्मा
22/11/2014

Monday, 3 November 2014

यह हिंदी  मुझसे बात करती है
जैसे सास और ननद मिलकर
नयी  बहू से घात करती  है
बहू की सुरीली गीत
नयी नवेली  प्रीत
पिया मिलन की रात
नयी तरह की बात
हिंदी सास ननद को खटकती है
मंच पर माथा पटकती है
 रिश्तों की डोरी चटकती है
कविता की मंडी में मंदी है
तमाम तरह की गोलबंदी है
फिर भी कुछ जुगलबंदी है
एक बूढ़ा  अपनी हड्डी बजाता है
कुसुमित कपोलों पर कंकाल घुमाता है
समय खायी जीभ मोहर है
हिंदीवाला गाता सोहर है
बहू की निकलती  आह है
यह कैसी  सौतिया डाह है
अनिल कुमार शर्मा
04/11/1972

Sunday, 2 November 2014

विसर्जित आदर्शो से प्रदूषित नदी
परम्पराओं की नेकी- बदी
खुलती ढोल की पोल है
इतिहास से भागा हुआ
एक विचित्र भूगोल है
अब ज़मीन को आसमान से देखते है
अजीब आंकड़े फेकते है
यह तो नया परिवेश है
सिर्फ निवेश है निवेश है
सिर्फ बेचो खरीदो का सन्देश
इसी रास्ते पर अपना देश है
 पानी बोतल में है
जमीन  होटल में है
जिंदगी मॉल में है
जो बची -खुची है
मौत के जाल में है
बहुधन्धी कारोबार है
विचित्र रोजगार है
बूढ़ा बेकार है
पाता पगार है
युवा बेरोजगार है
अपनी सरकार है
शिक्षा संविदा पर है
विभाग खाली है
देश में एक  खाई है
बहती जिसमे नाली है
सपने दिखने के बाद भी
अभी सपनों की जगह खाली है
अनिल कुमार शर्मा ०३/११/२०१४

Saturday, 1 November 2014

What is first and what is last
Tell my life to apparent death
For my atheism and utter faith
I am a story among so many stories
Of men who born and dead
With bright glory and fade death
 Anil Kumar Sharma 02/11/2014