Monday, 28 April 2014

The air was blown
And clouds were shattered
This is a dry season
The sun is very hot
I am cold inside me
And see a dragon
Who gulps all social needs
Fertile land with weeds
Alas I need these needs
A concept, a value, a life
Moral, love and strife
Books for guidance
Problems for diffidence
A life to indulgence
And what is enjoyment
 Beyond physical needs
And spiritual gain
And what is survival breathe
And what is above life and beneath
My soul moves in a circle
I never surpass this confined home
What I seek I seek alone.
Anil Kumar Sharma 28/04/2014




Sunday, 6 April 2014

राजनीति के घूरे पर
आओ कुछ कूड़े डाले यार
सड़े कमल की रंगीन पँखुरियाँ
कटे हाथ की खुनी अंगुलियां
कुछ कीट पतंगे
कुछ मच्छर भुनगे
कुछ कुत्ते  कुछ सूवर है
चरित्र की बदबू कुछ ढके हुए
गांधी जी की टोपी में
कुछ धर्मों की पोथी में
कुछ सड़े समाजवाद के नाले में
कुछ विकसित घोटाले में
कुछ ईमान चिल्लाने वाले
उकठे पेड़ हिलाने वाले
सब कौवे हंस बने है
घटिया भी परमहंस बने है
जीते कोई या जाये हार
राजनीति के घूरे पर
आओ कुछ कूड़े डाले यार
अनिल कुमार शर्मा

Saturday, 5 April 2014

मध्यवर्गीदरिद्रों
मध्यवर्गीय दरिद्रों !खुश हो जाओ
शहर में सेल और महा सेल आया है
नयी आकांक्षाओ को फ़रमाया है
एक खरीदो तो एक मुफ्त है
इस बाज़ार में बड़ा लुफ्त है
ये अजीब लोग है
सिर्फ उपभोक्ता और उपभोग है
अब तो यहाँ लोन मेला लगता है
तुम्हारी औकात को किस्तों में ठगता है
इसी में सुबिधा जनक बीमा है
वही उत्पाद का ले लिया जिम्मा है
अब तो लोग बाज़ार में पैदा होते है
यहीं मिलते हैं यहीं खोते हैं
बाज़ार में जगते हैं बाज़ार में सोते हैं
लेनी में हँसते हैं देनी में रोते हैं
उधार में अपनी जिंदगी पिरोते हैं
कर्ज के बीज से खेत बोते है
अपने नीयत में जब हम बाज़ार होते है
जेब के बाहर कितने लाचार होते हैं
बाज़ार ने ऐसा डाका डाला है
घर की तिजोरी खाली है
मुरझाये चेहरों पर
कई ब्राण्डों की लगी होठ -लाली है
उपयोगिता और गुणवत्ता के सवाल पर
एक अजीब सा तर्क और वितर्क है
इसी शौकीनी में फँसा
दरिद्रों का मध्य वर्ग है
बेचने और खरीदने के नरक में
ढूढता अजीब सा स्वर्ग है
अनिल कुमार शर्मा ०५/०४/२०१४/

Tuesday, 1 April 2014

क्लिनिक
क्लिनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार है
दूसरे में एम ०आर ० है
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा
और एक स्मार्ट  लड़का है
जो भीतर बाहर आता -जाता है
पैथोलॉजी का रास्ता दिखाता है
बीच में एक डॉक्टर बैठा है
जिसका गला टाई में ऐठा है
जो दिल को दिमाग में जाने से रोकता है
सोफा पर बैठा टेरियर भौकता है
मैं मरीज़ की हैसियत से जाता हूँ
और वहाँ पता हूँ
कंपनी के पैड पर
कंपनी की कलम से
कंपनी की दवा उभरती है
जिससे उन तीनों की हालत सुधरती है
चौथा मैं बीमार हूँ
इस कदर लाचार हूँ
पर्चे की दवा और दुकान
मेरी जेब पर भरी है
यह ऎसी महामारी है
जो इलाज से फैली है
किसी की जेब खाली
तो  किसी की भरी थैली है
 भाई साहेब !
आज यही क्लिनिक की शैली है
अनिल कुमार शर्मा
 
र हूँ