Thursday, 17 October 2019

जिसको मैंने तैरना सिखाया.
वो अब मुझको डूबा रहा है
बाजार की हसरतों को
अपने मन में ऊगा रहा है
मेरी उम्र की दहलीज है
वह ज़माना दिखा रहा है
नए के आगोश में खोकर
मुझको पुराना बता रहा है
उम्मीद की जो मीठी नदी थी
विकास में खारा बना रहा है
पंख खुलने  से पहले क़तर कर
परिंदों को  बेचारा बना रहा है
यह किस  रौशनी का दौर है ?
दिन को अँधेरा बता रहा है
उम्मीद की जवान हसरतों को
बहुत थका -हारा बता रहा है
बिक गयी ज़मीर जिसकी
वह अंधेरों को उजाला बता रहा है
काँटों की लड़ी पिरोकर अब
उसको फूलों की माला बता रहा है
मीठे आम के बगीचे उखाड़कर
कंटीले बाबुल ऊगा रहा है
जिसको  मैंने तैरना सिखाया
वो अब मुझको डूबा रहा है |
----अनिल कुमार शर्मा
१६/०९/२०१९




Friday, 16 August 2019

कमला कृति: पुस्तक समीक्षा: कंगाल होता जनतंत्र–एम.एम.चन्द्रा

कमला कृति: पुस्तक समीक्षा: कंगाल होता जनतंत्र–एम.एम.चन्द्रा: मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता.. ‘कंगाल होता जनतंत्र’ अनिल कुमार शर्मा का पहला काव्य संग्रह है. यह संग्रह पिछले दो दशकों के ...

Tuesday, 30 April 2019

जिन्हे दुःख है
वो दुःखी हैं
जिन्हे सुख है
वो भी दुखी हैं
अपने से या  दूसरों से
देवताओं से या असुरों से
काँटों से या फूलों से
टूटते वसूलों से
जिंदगी एक किताब है
जिसके पन्ने -पन्ने फटे हैं
क्यों आदमी आदमी  से
इस कदर कटे हैं
मैं तो तमाम भाषाओँ में
उलझ कर रह गया हूँ
किसी की कोई बात
किसी से कह गया हूँ
एक जज्बात में बह गया हूँ
आदमियों के भीड़ में
आदमी होने का दर्द सह गया हूँ |
अनिल कुमार शर्मा
०१/०५ /२०१९ 

Sunday, 24 February 2019

मूर्धन्यगति
कविता की सूरत से
कविता की सीरत तक
मठों मठों में
लूटी गयी
हज़ार अस्मिताओं की
वेदनाएं और  संवेदनाएं
पुष्पित पल्ल्वित होने के बाद
पतझड़ में झड़ गयी
बर्तिका दल और पराग
कुछ बीज मात्र बच गए
इस बंजर जमीन पर
जहाँ स्थापना और विस्थापना
के काले धंधे चलते हैं
किसी मूर्धन्य की
छत्र -छाया में पलते हैं
विशेषता अपनी है
जुगाड़ में खपनी है
कहीं का पहिया
कहीं की स्टेपनी है
लिखता कम
ज्यादा चीखता है
यह आदमी अभ्यस्त है
जगह -जगह मंचस्त है
निर्णय में विकार है
अजीब सा अधिकार है
मूर्धन्यों पर थूकता था
और मूर्धन्य उसे
प्रसाद मानकर चाटते थे
एक कुत्ते के पीछे
दूसरे कुत्ते को काटते थे
अब वह भौतिक शरीर
से समाप्त हो गया
साहित्य का एक मठाधीश
मूर्धन्यगति को प्राप्त हो गया |
अनिल कुमार शर्मा
24-02-2019

Tuesday, 29 January 2019

The first and the last chapter
I opened and finished
And closed the book
Yet books are waiting
To be finished and  to start
Life is flapping like loose papers
There are different types of binders
Close to contents and index
Chapter by chapter
Letter by letter
Word by word
Values of absurd
There is a glory
Glows forever
Dims never
But dark is rampant
Deep in blue heart
Over crimson mind
Who is going ahead of me
And who will follow  me
What are matters there to be see
Books are wide open
Where we can see
Anil Kumar Sharma
30/01/2019



Saturday, 12 January 2019

कुछ बदतर लोगो की बेहतर जिंदगी
और तमाम बेहतर लोगो की बदतर जिंदगी
बीज से पनप कर वृक्ष बनती समस्याएं
और समस्याओं का व्यापार करते लोग
अब तो ठगों का बाजार चमक रहा है
विकास का अवशिष्ट महक रहा है
अब तो सब कुछ बिक सकता है
और सब कुछ ख़रीदा जा सकता है
वे तो नरक का कष्ट बेचकर
स्वर्ग का टिकट खरीदते हैं
कुछ पेट के लिए तो कुछ टेंट के लिए
मजबूर होकर सब कुछ बेचते है
 कुछ लोग स्वभाव से ही बिकाऊ होते हैं
सड़ -गल कर किसी तरह बिक जाते है
 कुर्सी के इर्द-गिर्द गन्दगी जैसे  टिक जाते हैं
फिर भी कैसा संयोग है
ये माननीय लोग हैं |
--------------------------अनिल कुमार शर्मा
१२ /०१ २०१९