Sunday, 24 February 2019

मूर्धन्यगति
कविता की सूरत से
कविता की सीरत तक
मठों मठों में
लूटी गयी
हज़ार अस्मिताओं की
वेदनाएं और  संवेदनाएं
पुष्पित पल्ल्वित होने के बाद
पतझड़ में झड़ गयी
बर्तिका दल और पराग
कुछ बीज मात्र बच गए
इस बंजर जमीन पर
जहाँ स्थापना और विस्थापना
के काले धंधे चलते हैं
किसी मूर्धन्य की
छत्र -छाया में पलते हैं
विशेषता अपनी है
जुगाड़ में खपनी है
कहीं का पहिया
कहीं की स्टेपनी है
लिखता कम
ज्यादा चीखता है
यह आदमी अभ्यस्त है
जगह -जगह मंचस्त है
निर्णय में विकार है
अजीब सा अधिकार है
मूर्धन्यों पर थूकता था
और मूर्धन्य उसे
प्रसाद मानकर चाटते थे
एक कुत्ते के पीछे
दूसरे कुत्ते को काटते थे
अब वह भौतिक शरीर
से समाप्त हो गया
साहित्य का एक मठाधीश
मूर्धन्यगति को प्राप्त हो गया |
अनिल कुमार शर्मा
24-02-2019

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