Tuesday, 15 August 2017

किसकी कितनी आजादी है
धोती कुरता खादी है
जय बोलो महात्मा गाँधी है
डंडे में लटका एक झंडा है
उसके ऊपर एक फंदा है
जिससे  डोरी लटक रही है
हवाएँ किसको झटक रही हैं
खूनी पंजो में सिसक रही है
आज़ादी क्यों झिझक रही है
जगह है जिनकी कारागारों में
संसद को  हथियाये बैठे है
अपने दुर्दम पैरों से
जनमत को  लतियाये बैठे है
 भूखी जनता के ऊपर तो 
उनकी भर रही  तिजोरी है
अफसर के ऑफिस में
रोज  बढ़ रही घूसखोरी है
सत्ताधारी उन्मादों में
क़ानूनी गहरी  माँदों में
विषधर से लहराते है
आज़ादी के झंडे को
तिकड़म से फहराते  है
सड़ी हुई नैतिकता में
निरर्थक आदर्श बतियाते है
किसी तरह से कहीं भी
कुर्सी को हथियाते है
अब आदर्श यहाँ पर कुर्सीवादी है
किसकी कितनी आज़ादी है ?
अनिल कुमार शर्मा
15 /8 /2017







Sunday, 13 August 2017

           कुर्सीवाद
यहाँ न तो  बीज है न खाद है
अब जिंदगियां  सिर्फ बरबाद हैं
सपनों से पहले या सपनों के बाद है
मित्र सिर्फ सत्ता का  कुर्सीवाद है
यहाँ तो सिर्फ घुटन है टूटन है
जिंदगी के सफर का छूटन है
अब तो कोई कली  नहीं खिलती
क़र्ज़ पर भी साँस नहीं मिलती
निवेश के लिए घूमता  नंगा है
शांति के ढोंग में फैलता दंगा है
अब समय कितना हो  गया अजीब
नवजातों को उम्र भी नहीं होती  नसीब
इस विकास के अँधेरे में किधर भटक रहे हैं
स्वर्ग की तलाश में त्रिशंकु जैसे लटक रहे हैं
यह क्या है ? रोशनी है या रोशनी का धोखा है ?
नमक लगे न फिटकिरी और रंग भी  चोखा है
आशा की टहनी पर छा गयी निराशा
गंगा जी की नियत बन  गयी कर्मनाशा
सत्य पर झूठ हो रहा आबाद है
इस दौर में सिर्फ कुर्सीवाद है
जब आदमी कुर्सी में ढलता है
पूँजी के टुकड़ों पर पलता है
कुर्सी की बोली बोलता है
खाली जेब टटोलता है
अपनी संवेदनाओं को मारता है
भीतर के इंसानियत  डकारता है
विषधर की तरह फुँफकारता है
बिच्छु की तरह डंक मारता है
 न सवाल है न जबाब है
उसका सतरंजी अंदाज़ है
अजीब कुर्सीवाद है |
अनिल कुमार शर्मा
13 / 8 /2017