एक झूठ को सच की तरह जी रहा हूँ
आग को पानी की तरह पी रहा हूँ
जलते हुए लोगों से जो बच गया
वह मैं हूँ आदमी के शक्ल में
आज के आदमी के काबिल नहीं
किसी मूल्य के जीवाश्म सा
संग्रहालयों में चमकता हुआ
वर्तमान में अतीत की तरह
स्वयं में व्यतीत की तरह
खुद की उम्र से घायल हूँ
किसी वृद्ध नर्तकी का पायल हूँ
अपने वजूद का कमजोर पक्ष
खूनी हवाओं से बचाते हुए
जिक्र में बेहद नरम हूँ
मिज़ाज़ में गरम हूँ
अनसुलझा भरम हूँ
अनिल कुमार शर्मा
31/12/2016
आग को पानी की तरह पी रहा हूँ
जलते हुए लोगों से जो बच गया
वह मैं हूँ आदमी के शक्ल में
आज के आदमी के काबिल नहीं
किसी मूल्य के जीवाश्म सा
संग्रहालयों में चमकता हुआ
वर्तमान में अतीत की तरह
स्वयं में व्यतीत की तरह
खुद की उम्र से घायल हूँ
किसी वृद्ध नर्तकी का पायल हूँ
अपने वजूद का कमजोर पक्ष
खूनी हवाओं से बचाते हुए
जिक्र में बेहद नरम हूँ
मिज़ाज़ में गरम हूँ
अनसुलझा भरम हूँ
अनिल कुमार शर्मा
31/12/2016