Saturday, 31 December 2016

एक झूठ को सच की तरह जी रहा हूँ
आग को पानी की तरह पी रहा हूँ
जलते हुए लोगों से जो बच गया
वह मैं हूँ आदमी के शक्ल में
आज के आदमी के काबिल नहीं
किसी मूल्य के जीवाश्म सा
संग्रहालयों में चमकता हुआ
वर्तमान में अतीत की तरह
स्वयं में व्यतीत की तरह
खुद की उम्र से घायल हूँ
किसी  वृद्ध  नर्तकी का पायल हूँ
अपने वजूद का कमजोर पक्ष
खूनी हवाओं से बचाते हुए
जिक्र में बेहद नरम हूँ
मिज़ाज़ में गरम हूँ
 अनसुलझा भरम हूँ
अनिल कुमार शर्मा
31/12/2016

Wednesday, 14 December 2016

मैं तो  अँधेरे में जी रहा था
टिमटिमाती ढिबरी के सहारे
उसने मेरी झोपड़ी में
आग लगाकर रोशनी कर दी
अब मैं बेसहारा बन कर
इस रोशनी में जल रहा हूँ
नमक की हाड़ी की तरह
जाड़े में  गल रहा हूँ
जौ तो साबुत बचे हुए हैं
जो घुन है पिस रहे है
 यह जो डिजिटल चक्की है
कोई  साज़िश पक्की है
दिवंगत होती मुद्राओं के श्राद्ध में
कितने कतारों में दिवंगत हुए
प्रश्न की परिधि में पूँजी की चाल है
देश में   बिछायी गयी कोई जाल है
मैं स्वयं की परिधि से वंचित हूँ
हवा पीते हुए भूख में संचित हूँ
मेरी लक्ष्मी अनर्थव्यवस्था में बंद है
व्यवस्था से आती कोई दुर्गन्ध है
खाता -बही में  तो समृद्ध हूँ
हक़ीक़त में  कंगाल हूँ
मुफ़लिसी में नोचता बाल हूँ
अनर्थशास्त्रियों के ज्ञान से
हो गया ख़स्ता -हाल हूँ
वित्त वंचित इंसान हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
14/12/2016






Tuesday, 6 December 2016

घड़ियाल भी आँसू बहाता है
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज़ जाती है
 जिसकी लाठी उसकी भैंस कहलाती है
आस्तीन का साँप भी होता है
और कौआ कान ले जाता है
मुख में राम बगल में छूड़ी
चांस मिले तो काटे मूड़ी
बकरे की माँ कब तक  खैर मनायेगी
वह घड़ी कभी तो आएगी
हंस चुगेगा दाना - पानी
कौआ मोती खायेगा
यह सब अपने ही देश में होता है
जिस थाली में खाता है
उसी में छेद करता है
एक शुद्ध मूर्ख भी  बात करता है
 बिके हुए ज़मीर को तो
हर  हक़ीक़त रंगीन दिखती है
क्या करें जिन्दा लाश चीखती है
कतारों में लगी अपनी रूह दिखती है
अब तो सफ़ेद चीज भी काली दिखती है
गंगाजी भी नाली दिखती है
तिजोरी तो भर गयी
अपनी जेब ख़ाली दिखती है
अनिल कुमार शर्मा
 06/12/2016