Friday, 23 September 2016

जब भी मेरा भारत महान होता है
मेरा दिल सारे जहाँ से अच्छा
हिन्दोस्तां होने को बेताब होता है
घूसखोर हाथों से जब तिरंगा फहरता है
मेरा दिल क्यों इतना कहरता है
बापू तुम तो भ्रष्ट ऑफिसों  में टंगे हो
घुस के लिफाफे में लाखों करोङो में बंधे हो
तुम्हारे आज़ाद बन्दर न बुरा देखते हैं
न बुरा सुनते है न ही बुरा कहते है
सिर्फ कुछ कुछ बुरा करते है
क्योकि बंदरों को बुरा करने से
आपने मना नहीं किया था
सरकार के तीनो बन्दर जब
जम्बू दीप के आर्यावर्त के
भारतभूमि खंड में उछलते है
इंसानियत को जब कुचलते है
मुझे तुम्हारी अहिंसा याद आती है
इन बंदरों  सारी हिंसा भूल जाती है
विधायिका  के बन्दर बुरा नहीं कहते
न्यायपालिका के बन्दर बुरा नहीं सुनते
कार्यपालिका के बन्दर बुरा नहीं देखते
क्योकि अपना भारत शुरू से महान है
विश्वगुरु का लिया  हुआ ज्ञान है
यही तो नए विकास का विज्ञानं है
यहाँ किस अँधेरे का भान होता है
जब भी मेरा भारत महान होता है
मेरा दिल  सारे जहाँ से अच्छा
हिन्दोस्तां होने को बेताब होता है
अनिल कुमार शर्मा
२३/०९/२०१६



Wednesday, 14 September 2016

आज तो सब कुछ हिन्दीमय लग रहा है
यह कातिलाना अंदाज़ किसको ठग रहा है
लगता है कोई अधूरा स्वप्न जग रहा है
क्या सूखे फूल पर तितली मँड़राती है ?
किस अँधेरे में यह कोयल गाती है
अब तो दिया अलग है अलग बाती  है
यह जो जुगाड़ू हिंदीवालों  की थाती है
अंग्रेजी पीती है और अंग्रेजी खाती है
देशी को हिंदीबाज़ी  से फुसलाती है
स्वघोषित मूर्धन्यों की कलाबाज़ी है
परम्परा में छेद खोजता प्रगतिवादी है
टूटे तेवर में कितना उछल रहा है
अपना देश कितना फुसल रहा है
भाषाओँ के ढेर में विविध अंदाज़ हैं
कोलाहल करते कितने ही साज़ है
भाषा है और कितनी ही विभाषा है
राष्ट्र तुम्हारे आवाज़ की क्या परिभाषा है ?
तुम तो कई भाषाओँ में बोलते हो
कितनों का गुप्त राज खोलते हो
तुम तो अनेक रहते हुए में एक हो
भाषा के मामले में भी प्रत्येक हो
कदम कदम पर ले रहे टेक हो
इसी में यह हिंदी आ जाती है
टिटिहिरी की तरह टर्राती है
हिन्दीवाले भी बूझते है
अहिन्दी वाले भी बूझते है
विचित्र बात पर जूझते है
गाते बजाते एक संग्राम है
यही हिंदी दिवस का प्रोग्राम है
भाई साहब आज हिंदी में सलाम है ।
अनिल कुमार शर्मा
१४/०९/२०१६









Sunday, 11 September 2016

उसकी सूरत कविता की झरबेरी में
लिपटी हुई  हिंदी की तरह है
मुँह में करैली जैसी आलोचना है
हाथ में कलम के बजाय कोंचना है
सौंदर्य में कृत्रिम भाषा बिलोरना है
वह तो एकांकी में  चिल्लाता है
रेखा चित्र में दाल भात खाता है
जुगाड़ी पत्रिकाओं के कालम में
दिन में उल्लू की तरह इतराता है
निराला का  चाचा मुक्तिबोध का
 कुछ और रिस्ते में खुद को पाता है
इस धुंध में बेहद प्रगतिशील है
खाली आसमान में उड़ता चील है
पुरस्कार पर झपट्टा मारता है
नियत में कुछ ज्यादा  रंगीन है
यह आदमी बड़ा संगीन है
अनिल कुमार शर्मा
११/०९/२०१६



Tuesday, 6 September 2016

का हो गुरु !
ब्रह्मा हो विष्णु हो महेश हो
चेला के आगे गोबर गनेश हो
अब तो चेला स्कूल चलाता  है
गुरूजी को वित्तविहीन कॉलेज में
पलिहर का  बन्दर का बनाता  है
खाली टिन की तरह बजाता है
चेला जब  चुनाव लड़ता है
गुरूजी पोस्टर चिपकाते है
दारू की पेटी भी छुपाते है
घटिया को बेहतर बताते है
अँधेरे में और अँधेरा दिखाते है
एक प्रशस्त कुमार्ग बनाते है
 चाणक्य के चाचा जनाते है
एकलव्य का अंगूठा मंगाते है
 आरुणि उपमन्यु और वेद से
गृहस्ती की मवेशी चरवाते है
विश्वामित्र की तरह जिद में
त्रिशंकू की दुर्दशा कराते है
कुछ तो चेला को फँसाकर
अपनी लंगोट बचाकर खुद पराते है
गुरु से हटकर गुरुघंटाल हो
परम ब्रह्म से  भरमजाल हो
सियार की तरह बाघ की ओढ़े खाल हो
जय जय गुरुघंटाल हो ।
अनिल कुमार शर्मा
05/09/2016











Sunday, 4 September 2016

इस जगत मिथ्या में
ब्रह्म सत्य की तलाश है
ज्ञान बुद्धि सब खलास है
छाया को छाया से काटता हूँ
माया में माया से भागता हूँ
एक नींद से दूसरी नींद में जागता  हूँ
मृगतृष्णा के पीछे  भागता हूँ
किसी  सत्य के कोने में झाँकता हूँ
सद्गुरु की चरणधूलि चाटता हूँ
शरीर के भीतर आत्मा है
और देखता हूँ
उस आत्मा का खात्मा  है
गज़ब का परमात्मा है
कई दुकानों में सजता है
तमाम भाषाओ में बजता है
हर जगह वही लगता है
मायाजाल के   भीतर और
इन संकल्पनाओं  के बाहर 
फिर वही दुनिया है
मुन्ना है और मुनिया है
विचित्र मायाजाल है
एक तुरुप चाल है
ज्योति जलती है
फिर बुझती है
अंधेरों की तरकीब सूझती है
समझते रहो समझाते रहो
सिद्धान्तों में उलझाते रहो
वह तो स्वघोषित सच्चे आदमी की तरह
सतरंगा झूठ बोलता है
अतिन्द्रिय बाज़ीगरी की दुकान खोलता है
आत्मा परमात्मा को तोलता है
ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या बोलता है
अनिल कुमार शर्मा
04/09/2016