Sunday, 14 February 2016

चलो हम भी मना लेते हैं
एक क़तरा प्यार का आज
नफरत भरे इस दौर में
एक लिजलिजी सी चीज है प्यार
सिर्फ भरोसे का व्यापार
मुझे डर लगता है इस कदर
महबूब तुझको लग जाये ना किसी की नज़र
ये गुलाब से खिले हुए दिल
कबूतर के जोड़ो से मिले हुए दिल
किसी वीरान में फड़फड़ाते है
एक हरे दरख्त के लिए तरस जाते है
जमींन से आसमान तक देखता हूँ
दिल के अरमान को फेंकता हूँ
प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ता हूँ
कई किताबो से लड़ता हूँ
बारी में प्रेम का ठौर तलाशता हूँ
हाट से प्यारा उपहार लाता हूँ
प्यार का यह दिन
बड़े प्यार से मनाता हूँ|
अनिल कुमार शर्मा
14/02/2016






Friday, 12 February 2016

व्यवहार के अनुरूप है
या आचार के अनुरूप है
या विचार के अनुरूप है
या बाजार के अनुरूप है
ये बता लोकतंत्र !
तेरा क्या सच्चा स्वरुप है
 जमींन जो जितनी दिखती है
किस कदर कितनी टिकती है
और किस तरह कहाँ बिकती है
प्रश्न यह है कि हम तुम्हारे लायक बनें
या तुम  हमारे लायक बनो
वीरान में किसी तम्बू की तरह तनो
मान लो मेरे देश तुझ पर कुर्बान हूँ
अपमान पीड़ित विचित्र स्वाभिमान हूँ
बाजार होते  इस संसार में
ढल रही अब सरकार है
 विचारधारा कितनी उदार है
सपने सट्टीबाज़ी में चढ़ रहे है
नयी व्यवस्था गढ़ रहे है
वे तो "मेक इन इंडिया" पढ़ रहे है
जब खेतों में डिजिटल फसलें उगेंगी
पानी भी नहीं मिलेगा जहाँ नौका डूबेगी
निवेश का दिन -दिन बढ़ता कटोरा
जनतंत्र वालों  ने अब इतना बटोरा
दफ़न के लिए जमींन कम पड़  गयी
बिना कफ़न के लाश सड़ गयी
विकास का जहर सांसों में घुल रहा है
किसकी जिंदगी कैसे वसूल रहा है
लोकतंत्र तुम्हारे नशे में चूर हूँ
उदारीकरण के आगोश में भरपूर हूँ
मुद्दा तो है सबको सब कुछ मिलेगा
जो  है वह सचमुच हिलेगा
अब तो परिवेश भी ठगा -ठगा सा है
दिल का चोर भी  जगा -जगा सा है
जमींन कहीं गीली है तो कहीं सूख रही है
देश की कोई रगती नस दुःख रही है
 यह बाजार हमारे लायक बने
या हम बाजार के लायक बनें
बता मेरे लोकतंत्र !
कितना जन  -गण मंगलदायक बनें ।
अनिल कुमार शर्मा
12/02/2016