Saturday, 31 January 2015

मेरे भ्रष्टकेतु
तुम्हारे अलग -अलग हेतु
लक्ष्मी बसना सत्ता रसना
आस्तीन के साँप की तरह
रह -रह कर डँसना
पक्ष में बसना
और विपक्ष में भी बसना
तुम तो एक अलग वर्ग हो
उसी में प्रत्यय और उपसर्ग हो
मेरी बात मेरी हलक से निकाल कर
मेरे विस्तार में कहते हो
फिर भी उसी खूँटे में बंधे रहते हो
नरम -नरम घास चरते हो
एक विचित्र संविधान पढ़ते हो
मेरे जनतंत्र के हेतु हो
धन्य भ्रष्टकेतु हो !
अनिल कुमार शर्मा
 ०१/०२/२०१५
A global hungry and
A local hungry
Meet across the globe
With abdomen of different sizes
Of power and prospect
Of final and nascent
Need each other
To cheat each other
Of overlapping desire
Some water and some fire
With dealing attire
Cleaning mud with mire.
Anil kumar Sharma
31/01/2015


Saturday, 10 January 2015

मैं  वही जगह हूँ
जहाँ से तुम जिंदगी की तरह चली गयी
क्योंकि जिंदगी तो  आती-जाती है
जगह अपनी जगह पर रह जाती है
बुनियाद  बन कर पछताती है
यही परम्परा  बतियाती है
किसी उम्मीद में मुरझाती है
समय की नदी में बह जाती है
वही बात फिर यहाँ से होकर
कितनी कितनी दूर निकल जाती है
इसी जगह पर जिंदगी
कही दूर से मुस्कराती है
पुराने ज़ज़्बात में फिर कही से
कोई नयी बात आती है
और कितने फूल खिलते है
कितनी तितलिया मँडराती है
जगह की साँस में चलती हवाएँ
ज़िन्दगी की गीत गाती है
कुछ उम्मीद सजाती है
यही युगों की थाती है
अनिल कुमार शर्मा
10/01/2015