वो उठ कर बैठ गए
मैं बैठ कर खड़ा रहा
सवाल जैसा पड़ा रहा
वो सिंहासन में जड़े रहे
मैं फूटपाथ में जड़ा रहा
यही कि जिंदगी चलती है
दिल में इतनी मचलती है
हंसी कही आँसुओं में पिघलती है
दर्द आह के साथ निकलती है
सपनों के साथ जलती है
अपने घरों में पराये सपने
या पराये घरों में अपने बनाये सपने
क्यों बुनियाद से टकराते है
रोते हुए मुस्कराते है
फलीभूत कर्मों के फल
कुछ ज्यादा सड़ा कर खाते है
मात्र दुर्गन्ध बनकर रह जाते हैं
अनिल कुमार शर्मा २९/१२/२०१४
मैं बैठ कर खड़ा रहा
सवाल जैसा पड़ा रहा
वो सिंहासन में जड़े रहे
मैं फूटपाथ में जड़ा रहा
यही कि जिंदगी चलती है
दिल में इतनी मचलती है
हंसी कही आँसुओं में पिघलती है
दर्द आह के साथ निकलती है
सपनों के साथ जलती है
अपने घरों में पराये सपने
या पराये घरों में अपने बनाये सपने
क्यों बुनियाद से टकराते है
रोते हुए मुस्कराते है
फलीभूत कर्मों के फल
कुछ ज्यादा सड़ा कर खाते है
मात्र दुर्गन्ध बनकर रह जाते हैं
अनिल कुमार शर्मा २९/१२/२०१४