वह अपनी भाषा में बोलता है
मैं अपनी भाषा में सुनता हूँ
शब्दों की प्रतीति ऐसी है
विभिन्न अर्थों को गुनता हूँ
अर्थ और आशय की दूरी
अपनी स्थितियों की मजबूरी
भाषायी पाखंडों की धुरी
लपलपाती जीभ से
गिरते हुए नमकीन शब्द
मिठास के आभास में
गुमसुम और निःशब्द
क्यों ज़मीन की बात खोती है
ज़मीन छोड़कर ज़मीन को देखना
हवा में खड़े होकर हवा को फेंकना
आखिर बुनियाद कहाँ पर है ?
अब तो भरोसे का तेवर
विश्वास को छलता है
सत्याभास गढ़ते हुए
झूठ में पलता है
यह जमाना
किस आग में जलता है ?
अनिल कुमार शर्मा
१३/०३/२०१७
मैं अपनी भाषा में सुनता हूँ
शब्दों की प्रतीति ऐसी है
विभिन्न अर्थों को गुनता हूँ
अर्थ और आशय की दूरी
अपनी स्थितियों की मजबूरी
भाषायी पाखंडों की धुरी
लपलपाती जीभ से
गिरते हुए नमकीन शब्द
मिठास के आभास में
गुमसुम और निःशब्द
क्यों ज़मीन की बात खोती है
ज़मीन छोड़कर ज़मीन को देखना
हवा में खड़े होकर हवा को फेंकना
आखिर बुनियाद कहाँ पर है ?
अब तो भरोसे का तेवर
विश्वास को छलता है
सत्याभास गढ़ते हुए
झूठ में पलता है
यह जमाना
किस आग में जलता है ?
अनिल कुमार शर्मा
१३/०३/२०१७