Friday, 21 August 2015

यह दुनिया है
और दोस्त इस दुनिया में दुःख है
सवाल यह है कि
 इस दुःख को कैसे काटा  जाये
इसे किस तरह बांटा जाये
जीवन के सन्दर्भ में इच्छाएं जीती हैं
तथागत !यह  मोक्ष भी एक इच्छा है
जीवन के आयाम की बृहत्तर इच्छा
इन सब दुखों से पार जाने का दुःख
कितना आनंद देता है
जीवन का अतिक्रमण
काल कुंचित देह से हटकर
विदेह की परिणति में
एक सजग निर्लिप्त प्रवाह
मोहता है मोह को
आत्मविवेचना के परे
वही है दुःख
अनंत सुखों को समेटे हुए
आशा तृष्णा से दूर
विशुद्ध आत्मा में
स्वयं परमात्मा में ।
अनिल कुमार शर्मा
21/08/2015

Sunday, 2 August 2015

मेरे दोस्त जो दुश्मन बन गए हो
आओ फिर से वही दोस्ती निभाओ
और सदा के दुश्मनो तुम भी
अपनी दुश्मनी दोस्ती में भुलाओ
चन्द लम्हे जो कंटीले रह गए
उनको भी गमकते से फूल बनाओ
कहीं तो क्लेश होता है
इन  टूटे दिलों के कोने में
जीतनी ख़ुशी होती है पाने में
उससे ज्यादा गम होता है खोने में
एक एक लम्हा गुजर जाता संजोने में
यह तो महज़ एक चुभती सी टीस है
जिसे मैंने पा कर खो दिया
दोस्त तेरी दुश्मनी पर रो दिया
अनिल कुमार शर्मा
०२/०८/२०१५