Sunday, 26 October 2014

कटोरे में खड़ी जनता
कटोरे में से कटोरा चुनती है
चुना हुआ कटोरा घूमता है
निवेश के चकाचौंध धुप में
सपनों को भूनता है
नफा नुकसान गुनता है
हरे खेत को बंजर बना दो
फिर किसी कंपनी को थमा दो
व्यापार ही  विकास है
प्रगति का आत्मप्रकाश है
राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय में बिक रहा है
कंपनी के प्रचार से
अंतर्निहित भ्रष्टाचार से
भिखमंगे की कटोरे वाली जनता में
यह कटोरा टिक रहा है
रेशमी लिबाश में दिख रहा है
बात बनाता है बात पकाता है 
निवेश का आयातित नमक मिलाकर
बात के भूखे लोंगो  बात खिलाता है
बात के दो घूंट पिलाता है
बात बड़ी यह है कि
वह अपनी बात जिलाता है
अनिल कुमार शर्मा ७२/१०/२०१४



Friday, 3 October 2014

किसके कितने हो गांधी जी
बहती राजनीति की आँधी जी
कोई झाड़ू है कोई भूखा है
कोई गीला है कोई सुखा है
कोई स्वदेशी है कोई खादी जी
किसके कितने हो गांधी जी
अन्ना के भूखे अनशन हो
स्वदेशी योग -नर्तक के हो
आप के स्वराजी टोपी हो
 मोदी के स्पेशल  झाड़ू हो
लगे रहो मुन्ना भाई के
तेवर बड़े जुझारू हो
इरोम शर्मीला के मांझी जी
किसके कितने हो गांधी जी
सत्य अहिंसा चरखे से हटकर
लकदक पोशाकों में अब
बातचीत के तेवर में
संकेत मात्र हो गांधी जी
किसके कितने हो गांधी जी
अनिल कुमार शर्मा
02/10/2014