Thursday, 17 October 2019

जिसको मैंने तैरना सिखाया.
वो अब मुझको डूबा रहा है
बाजार की हसरतों को
अपने मन में ऊगा रहा है
मेरी उम्र की दहलीज है
वह ज़माना दिखा रहा है
नए के आगोश में खोकर
मुझको पुराना बता रहा है
उम्मीद की जो मीठी नदी थी
विकास में खारा बना रहा है
पंख खुलने  से पहले क़तर कर
परिंदों को  बेचारा बना रहा है
यह किस  रौशनी का दौर है ?
दिन को अँधेरा बता रहा है
उम्मीद की जवान हसरतों को
बहुत थका -हारा बता रहा है
बिक गयी ज़मीर जिसकी
वह अंधेरों को उजाला बता रहा है
काँटों की लड़ी पिरोकर अब
उसको फूलों की माला बता रहा है
मीठे आम के बगीचे उखाड़कर
कंटीले बाबुल ऊगा रहा है
जिसको  मैंने तैरना सिखाया
वो अब मुझको डूबा रहा है |
----अनिल कुमार शर्मा
१६/०९/२०१९