Tuesday, 30 April 2019

जिन्हे दुःख है
वो दुःखी हैं
जिन्हे सुख है
वो भी दुखी हैं
अपने से या  दूसरों से
देवताओं से या असुरों से
काँटों से या फूलों से
टूटते वसूलों से
जिंदगी एक किताब है
जिसके पन्ने -पन्ने फटे हैं
क्यों आदमी आदमी  से
इस कदर कटे हैं
मैं तो तमाम भाषाओँ में
उलझ कर रह गया हूँ
किसी की कोई बात
किसी से कह गया हूँ
एक जज्बात में बह गया हूँ
आदमियों के भीड़ में
आदमी होने का दर्द सह गया हूँ |
अनिल कुमार शर्मा
०१/०५ /२०१९