जिन्हे दुःख है
वो दुःखी हैं
जिन्हे सुख है
वो भी दुखी हैं
अपने से या दूसरों से
देवताओं से या असुरों से
काँटों से या फूलों से
टूटते वसूलों से
जिंदगी एक किताब है
जिसके पन्ने -पन्ने फटे हैं
क्यों आदमी आदमी से
इस कदर कटे हैं
मैं तो तमाम भाषाओँ में
उलझ कर रह गया हूँ
किसी की कोई बात
किसी से कह गया हूँ
एक जज्बात में बह गया हूँ
आदमियों के भीड़ में
आदमी होने का दर्द सह गया हूँ |
अनिल कुमार शर्मा
०१/०५ /२०१९
वो दुःखी हैं
जिन्हे सुख है
वो भी दुखी हैं
अपने से या दूसरों से
देवताओं से या असुरों से
काँटों से या फूलों से
टूटते वसूलों से
जिंदगी एक किताब है
जिसके पन्ने -पन्ने फटे हैं
क्यों आदमी आदमी से
इस कदर कटे हैं
मैं तो तमाम भाषाओँ में
उलझ कर रह गया हूँ
किसी की कोई बात
किसी से कह गया हूँ
एक जज्बात में बह गया हूँ
आदमियों के भीड़ में
आदमी होने का दर्द सह गया हूँ |
अनिल कुमार शर्मा
०१/०५ /२०१९