Sunday, 31 December 2017

अलविदा उनको जो गुजर गए वक्त के साथ
स्वागत उनका जो आएंगे वक्त के साथ
कुछ हाथ हिलाते हुए चले गए
कुछ हाथ मिलाते हुए आ रहे हैं
वक्त के नशेमन में छा रहे है
बीते हुए बदरूप कुहरों में
नए उजालों  की उम्मीद ला रहे हैं
चेहरे वही हैं और मोहरे भी वही हैं
सिर्फ तारीखें बदल गयी हैं
मामूली सी उम्मीद ढल गयी है
वक्त में कोई चीज गुजर गयी है
वक्त में मैं सिमट रहा हूँ
और वक्त गुजर रहा है
खामोश शोरगुल की तरह
अर्थ की खोल ओढ़े अर्थहीनता
समृद्धि की गीत गाती दीनता
चाक- चौबंद  हैं पहरुए
 किसी उम्मीद में जुटे हुए
खुद से खुद को लुटे हुए
उम्मीद की कली चटक रही है
वक्त की डाल पर लटक रही है
नए की उम्मीद में पुराने को झटक रही है
वक्त पसारता कोई और है
 वक्त समेटता कोई और है
दोस्त वक्त का सुनहरा जाल है
मुबारक नया साल है |
@ अनिल कुमार शर्मा
०१/०१/२०१८