एक ज़माने की हिंदी में
प्रेमचंद होते थे
अब की हिंदी में
चंद प्रेम होते है
जो खेमेबंदी में खोते है
असली प्रेमचंद
नकली प्रेमचंद वालों में रोते हैं
अब तो प्रेमचंद कई चादरों में ढके है
जिनके कोने कोने भी फटे है
लेकिन एक बात जरूर है
प्रेमचंद को कोई कितना भी ढके
वो मेरी ओर झांकते जरूर हैं
जब कभी भी मैं अकड़ता हूँ
प्रेमचंद तोड़ते मेरा गरूर हैं
जमाना तेज है चाल मंद है
थके हुए प्रेमचंद है
अनिल कुमार शर्मा
३१/०७/२०१५
जन्मतिथी पर याद करते हुए
प्रेमचंद होते थे
अब की हिंदी में
चंद प्रेम होते है
जो खेमेबंदी में खोते है
असली प्रेमचंद
नकली प्रेमचंद वालों में रोते हैं
अब तो प्रेमचंद कई चादरों में ढके है
जिनके कोने कोने भी फटे है
लेकिन एक बात जरूर है
प्रेमचंद को कोई कितना भी ढके
वो मेरी ओर झांकते जरूर हैं
जब कभी भी मैं अकड़ता हूँ
प्रेमचंद तोड़ते मेरा गरूर हैं
जमाना तेज है चाल मंद है
थके हुए प्रेमचंद है
अनिल कुमार शर्मा
३१/०७/२०१५
जन्मतिथी पर याद करते हुए